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जनसेवा के क्षेत्र में रोल माॅडल बनीं पुष्पा पाल

अम्बेडकर नगर UP : महिलाओं व बच्चों के हित में कार्य करने के लिए रोल माॅडल के रूप में उभरी हैं अकबरपुर तहसील क्षेत्र के कुटियवा गांव निवासिनी पुष्पा पाल। पिता के निधन के बाद उन्होंने सामाजिक क्षेत्र में काम करने की चुनौती न सिर्फ स्वीकार किया वरन उसे अभी तक भली-भांति आगे बढ़ाया भी है। उनके इसी जज्बे व योगदान को देखते हुए राज्य सरकार ने गत वर्ष उन्हें रानी लक्ष्मी बाई पुरस्कार से लखनऊ में सम्मानित भी किया था। बेवाना ब्लाॅक भवन के शिलान्यास मौके पर भी पुष्पा को सम्मानित किया गया था। यूं तो सामाजिक संस्थाओं का जिक्र आते ही कई तरह के सवाल खड़े होने लगते हैं, लेकिन इन्हीं के बीच कुछ ऐसे लोग व कुछ ऐसी संस्थाएं भी हैं, जिनके द्वारा अपनी जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन किया जा रहा है। जिले के सीमावर्ती इलाके बेवाना के कुटियवा गांव में रहने वाले रामवदन पाल ने जन कल्याण के लिए सामाजिक संस्था जन शिक्षण केन्द्र का गठन किया था। वे अपनी मुहिम को अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश में जुटे ही थे कि उनका असामायिक निधन हो गया। संस्था से जुड़े लोग जब हताशा के दौर में थे, तभी रामवदन पाल की बेटी पुष्पा पाल ने बड़ा हौसला दिखाते हुए तय किया कि वे अपने पिता के अधूरे कार्यों को पूरा करने के लिए आगे आएंगी। इसके बाद उन्होंने समाज सेवा के क्षेत्र में खुलकर भागीदारी शुरू कर दी।नतीजा यह रहा कि उन्होंने अपने पिता की राह पर चलते हुए नए ढंग से कार्ययोजना विकसित की, और अकबरपूर, जलालपुर व कटेहरी विकास खंड के कुछ क्षेत्रों में महिलाओं, बच्चों व दिव्यांगों के लिए काम शुरू किया। पुष्पा के सामने शुरूआती दौर में कई कठिनाइयां भी आयीं, लेकिन उन्होंने उनका बखूबी मुकाबला किया। संसाधनों की परवाह किए बगैर वे लगातार गांव-गांव भ्रमण करती रहीं, और महिलाओं समेत सभी ग्रामीणों को जागरूक करने का अभियान तेज कर दिया। मौसम की परवाह किए बगैर वे अभी भी लगातार गांव-गांव पहुंचती हैं, जहां उनके संगठन के लोग पहले से ही ग्रामीणों को एकत्र किए रहते हैं। वहां उन्हें विभिन्न प्रकार से जागरूक किया जाता है। लोगों को पढ़ने लिखने का तौर तरीका मौके पर ही सिखाया जाता है। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल माननीय श्री रामनाईक गत वर्ष जिला मुख्यालय के एक कार्यक्रम में भाग लेने पहुंचे थे, तो वहां उन्होंने इस संगठन व उसके कार्यकर्ताओं का विस्तार से जिक्र किया था। दरअसल राज्यपाल जिले के महत्व को लेकर भाषण दे रहे थे। उसी क्रम में उन्होंने इस संगठन के कार्यों व प्रयासों का जिक्र किया था।

पूछने की आदत से शिक्षक परेशान होते थे

सत्या नडेला, माइक्रोसाॅफ्ट, सीईओ

मेरे पिता आईएएस अधिकारी थे। मैंने बेगमपेट स्थित हैदराबाद पब्लिक स्कूल से अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी की। बचपन से ही मैंने सोच लिया था कि मुझे टेक्नोलाॅजी के क्षेत्र में बड़ा काम करना है।  मैं हर चीज को उसकी संपूर्णता में जानना-समझना चाहता था। मुझे याद है, मणिपाल इंस्टीटयूट आॅफ टेक्नोलाॅजी में आने के बाद मैं अपने भविष्य के बारे में बहुत सोचता था। क्लास में मैं अध्यापकों से लगातार सवाल करता था, जबकि मेरे दोस्त खामोश बैठे रहते थे। सवाल पूछने की मेरी आदत से अध्यापक भी कई बार परेशान हो जाते थे। वहां हम दोस्तों के बीच अपने भविष्य पर बात करते थे। मेरे दोस्त कहते थे कि हार्डवेयर का भविष्य तो सन माइक्रोसिस्टम्स में है। लेकिन मैं उन्हें कहता था कि मुझे साॅफ्टवेयर के क्षेत्र में जाना चाहिए, मुझे मार्केटिंग में होना चाहिए और माइक्रोसाॅफ्ट मेरी मंजिल होनी चाहिए। 1992 में मैंने अनुपमा से शादी की, जो मेरे साथ स्कूल में पढ़ती थी और मेरे पिता के दोस्त की बेटी थी। उसी साल मैंने माइक्रोसाॅफ्ट जाॅइन की। शादी ने मेरा जीवन बदल दिया और माइक्रोसाॅफ्ट ने मुुझे वैश्विक पहचान दिलाई। हालांकि मैं ‘हर घर, हर डेस्क पर एक कंप्यूटर’ के बिल गेट्स के लक्ष्य को एक छोटा और तात्कालिक लक्ष्य मानता था, क्योंकि वह लक्ष्य तो करीब एक दर्शक में ही पूरा हो चुका था। मैं उन चंद लोगों में से था, जिसने कंपनी को क्लाउड कम्यूटिंग के बारे में बताया। नतीजतन कंपनी ने इसमें निवेश करना शुरू किया और जल्दी ही माइक्रोसाॅफ्ट ने क्लाउड कम्प्यूटिंग की वह तकनीक विकसित की, जिसने आईटी क्षेत्र की तस्वीर तो बदली ही, इससे माइक्रोसाॅफ्ट की आय में बहुत उछाल आया। वर्ष 2014 में माइक्रोसाॅफ्ट का सीईओ बनना मेरे जीवन का एक बड़ा घटनाक्रम था।

कविता अभिव्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है

खाली वक्त में मैं कविताएं और रूसी उपन्यास पढ़ना पसंद करता हूूं। मैं कविताओं को अभिव्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ माध्यम मानता हूं। भारतीय और अमेरिकी कविताएं मैं खूब पढ़ता हूं। मैं बचपन में अपनी स्कूल की क्रिकेट टीम का हिस्सा था और अब भी समय मिलने पर टीवी पर टेस्ट मैच देखता हूं। मैं मानता हंू कि टीम वर्क की समझ और नेतृत्व करने की क्षमता मुझमें इसी खेल के कारण विकसित हुई है। हालांकि फुटबाॅल भी मेरा पसंदीदा खेल है। सिएटल स्थित पेशेवर फुटबाॅल टीम सी-हाॅक का मैं फैन हूं। मैं फिटनेस के प्रति सजग हूं और हमेशा दौड़ता हूं।

मैं एक पारिवारिक आदमी हूं

मेरा स्वभाव मेरे काम के ठीक विपरीत है। मैं एक पारिवारिक आदमी हूं। आज भी काम के बाद मेरा वक्त पत्नी और तीन बच्चों के इर्द-गिर्द ही बीतता है। स्कूल और काॅलेज के दोस्तों के संपर्क में मैं आज भी हूं। पर मैं सोशल मीडिया पर सक्रिय नहीं हूं। वर्ष 2010 के बाद मैंने ट्वीट नहीं किया। हालांकि मुझे भाषण देना अच्छा लगता है। लेकिन रिजर्व रहना पसंद करता हूं।

एक पेड़ के नीचे बैठकर भी शुरू हो सकती है पहल

डा. किरण मार्टिन

मैं एक डाॅक्टर हूं शुरू से ही मुझमें  गरीब और बेसहारा लोगों की सेवा करने की भावना रही है। वर्ष 1988 की बात है। अचानक मुझे एक दिन पता चला कि दक्षिण दिल्ली की झुग्गी-बस्तियों में हैजा फैल गया है, जिस कारण स्थिति गंभीर है। मैंने उसी समय वहां का रूख किया। पर झुग्गी में घुसते ही मैं स्तब्ध रह गई। उससे पहले मैं कभी झुग्गी के अंदर नही गई थी। वहां चारों तरफ गंदगी बिखरी थी। बच्चे गंदगी के पास ही खेल रहे थे। मैंने तत्काल किसी के एक मेज मांगा और एक पेड़ नीचे बैठ गई। और तभी बीमारों का इलाज शुरू हो गया। झुग्गी-बस्ती के लोग जहां मेरे पास इलाज के लिए आने लगे, वहीं बाहर के कुछ लोगों ने भी मेरा साथ दिया। बहुत से लोगों ने मेरी मदद भी की। मैंने उसी झुग्गी बस्ती में एक छोटे से कमरे में अपनी क्लीनिक खोली। कुछ दिनों तक वहां काम करने के बाद मैंने खासकर वहां की औरतों की दशा सुधारने के लिए आशा सोसाइटी की स्थापना की। मुझे लगा कि अगर मैं झुग्गी की महिलाओं के रहन-सहन और उनकी सोच में बदलाव ला पाई, तो यह उनके लिए ज्यादा मददगार साबित होगा।

                        मैंने वहां की औरतों को कम्युनिटी हेल्थ वर्कर के रूप में तैयार करना शुरू किया। यह आसान नही था। जिन औरतों को अपने स्वास्थ्य की बेहतरी के बारे में कुछ पता नहीं था, उन्हें दूसरी महिलाओं और बच्चों को स्वस्थ रखने की जिम्मेदारी देने, उन्हें साफ-सफाई का महत्व समझाने के लिए तैयार करने में वक्त लगना ही था। लेकिन मैंने यह भी पाया कि खुद को बदलने के मामले में महिलाएं पुरूषों की तुलना में आगे थीं और उनमें सामूहिकता की भावना ज्यादा मजबूत थी। एक महिला को कोई जानकारी दी जाती, तो कुछ ही समय में सारी औरतों को इस बारे में पता चल जाता था। मैंने उन्हें पौष्टिक भोजन, साफ-सफाई, खुले में शौच की आदत छोड़ने और बच्चों के टीकाकरण के बारे में समझाया।  जल्दी ही नतीजा सामने आने लगा। झुग्गियों की स्थिति सुधरने लगी। आज हर झुग्गी बस्ती में एक आशा सोसाइटी है, जहां एक क्लीनिक है। इन क्लीनिकों में डाॅक्टर और प्रशिक्षित नर्स तो हैं ही कुछ क्लीनिकों में एक्स-रे और ईसीजी की भी व्यवस्था है। आशा सोसाइटी महिलाओं के लिए छह महीने का प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाती है। इसके बाद उन्हें एक मेडिकल बाॅक्स दिया जाता है। फिर ये महिलाएं झुग्गी-बस्तियों में जाकर महिलाओं को स्वास्थ्य और साफ-सफाई के बारे में बताती हैं।  आशा सोसाइटी के हस्तक्षेप से दिल्ली की झुग्गी-बस्तियों में नवजात मृत्यु दर तो घटी ही है, प्रसव के समय माताओं की मृत्यु के मामले भी न के बराबर रह गए हैं। हालांकि झुग्गियों में मेरा प्रवेश वहां के अनेक पुरूषों को अच्छा नहीं लगा। उन्हें महसूस हुआ कि यह लेडी डाॅक्टर उनकी पुरूष सत्ता को चुनौती देने आई है। पुरूषों की यह वर्चस्ववादी भावना अभी खत्म नही हुई। झुग्गियों में तो इसकी उम्मीद कर ही नहीं सकते, जहां के मर्दाें का शिक्षा और आधुनिक सोच से बहुत कम रिश्ता है। पर मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है। आज मैं दिल्ली की करीब साठ झुग्गी-बस्तियों में घूमती हूं। वहां के पांच लाख से अधिक मरीज मेरी देख-रेख में ठीक हुए हैं। अब झुग्गियों में रहने वाले लोगों का जीवन स्तर सुधरा है और उनकी आय भी बढ़ी है।

घायल जीवों के लिए भी हेल्पलाइन

– अभिनव श्रीहन
बचपन से ही मुझे पशु-पक्षियों से प्यार था। हम दिल्ली के मोतीबाग की सरकारी काॅलोनी मं रहते थे। वहां मैं पिल्लों के लिए छोटे-छोटे घर बनाता था। लेकिन मेरे वहां से हटते ही लोग पत्थर मारकर उन्हें तोड़ देते थे। फिर मैंने एक दिन उन पिल्लों के लिए अंडरग्राउंड घर बनाए। पर उस दिन इतनी बारिश हुई कि उनमें पानी भर गया। मैं एक थैले में उन पिल्लों को भरकर घर ले आया। थोड़ा बड़ा हुआ, तो मैंने घायल पशु-पक्षियों की सेवा-सुश्रुषा शुरू की और वैसी जगहों पर नियमित जाने लगा, जहां ऐसे पशु रखे जाते थे। मैं चूंकि फिल्में बनाता हूं, लिहाजा मैंने पशुओं की देखभाल आदि पर टेलीविजन कार्यक्रम बनाने के बारे में सोचा था। लेकिन चूंकि वह संभव नहीं हो पाया, ऐसे में, टीवी चैनलों के लिए छोटी-छोटी फिल्में बनाता हूं। फिर मैंने घायल पक्षियों की देख-देख के लिए ‘फाॅना पुलिस’नाम से एक हेल्पलाइन गठित की। दरअसल मैं डिस्कवरी चैनल पर ‘एनिमल पुलिस’ नाम का कार्यक्रम देखा करता था, जिसमें एक टीम जाकर घायल पशुओं को बचाती थी। इसी से फाॅना पुलिस का विचार आया। बाद में हमारी इस हेल्पलाइन में घायल पशुओं की देख-रेख को भी जोड़ा गया।
लेकिन मेरा अभियान सिर्फ इनकी सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि मैं पशु-पक्षियों के प्रति लोगों को जागरूक करने की कोशिश करता हूं, क्योंकि जब तक हम पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशील नहीं होंगे, तब तक मेरे या दूसरे लोगों द्वारा चलाए जाने वाले अभियान का कोई खास अर्थ नहीं होगा। हमारी टीम ने तोतों को पिंजरे में बंद करने के खिलाफ दिल्ली के माॅल में अभियान चलाया। कम लोग जानते है कि पिंजरे में रहने वाली चिड़िया घायल हो जाती है। ऐसी चिड़ियों को हम बचा तो लेते हैं, पर वे बहुत दिनों तक उड़ने की स्थिति में नहीं होती।
दिल्ली में आवारा कुत्तों के प्रति लोगों के उदासीन रवैये ने मुझे बहुत आहत किया। हमारी टीम ने दिल्ली के खान मार्केट में एक अभियान चलाया, ‘किल एबांउड डाॅग्स’ (सड़कों पर छोड़ दिए गए कुत्तों को मार डालो) हमारी पूरी टीम यह स्लोगल लिखे टी-शर्ट पहनकर जब वहां घूमने लगी, तो हमें अद्भुत अनुभव मिला। कुछ लोगों ने कहा कि यह शानदार आइडिया है, आवारा कुत्तों को मार डालना चाहिए। जबकि ज्यादातर लोग ऐसे कुत्तों के प्रति मानवीय नजरिया रखते थे। खान मार्केट में हमने पाया कि लोग अपने पालतू कुत्तों से तो प्यार करते थे, लेकिन गली के कुत्तों से नफरत करते थे। हमने न केवल उन्हें अपना नजरिया बदलने के लिए कहा, बल्कि यह भी बताया कि गली के कुत्ते वस्तुतः हमारा कितना उपकार करते हैं। पिछले दिनों हम बुंदेलखंड में गायों को बचाने के अभियान में गए थे। वहां चार साल बाद खेती की स्थिति सुधरी, तो विगत नवंबर में लोगों ने तमाम गायों को स्कूलों, अस्पतालों और ऐसी दूसरी जगहों में बंद कर दिया था, ताकि वे फसल में मुंह न मारें। इन गायों को खाने के लिए कुछ नहीं दिया जा रहा था! हमने वहां कुछ स्थानीय लोगों की मदद ली और गायांे को चारा-पानी मुहैया कराने के साथ उन्हें मुक्त कराने का अभियान भी शुरू किया। हमने बंुदेलखंड के अकेले महोबा जिले के 102 गांवों में यह अभियान चलाया। इससे स्थिति तो सुधरी, पर अनेक गाएं मर गईं। यह अभियान बचत के पैसों से चलता है, आर्थिक मदद बहुत कम मिलती है, लेकिन पशु-पक्षियों को बचाने का मेरा यह काम निरंतर जारी रहेगा।

जब-जब राम ने जन्म लिया तब-तब पाया वनवास!

– डाॅ. जगदीश गांधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक,
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
राम ने बचपन में ही प्रभु की इच्छा तथा आज्ञा को पहचान लिया और उन्होंने अपने शरीर के पिता राजा दशरथ के वचन को निभाने के लिए हँसते हुए 14 वर्षो तक वनवास का दुःख झेला। लंका के राजा रावण ने अपने अमर्यादित व्यवहार से धरती पर आतंक फैला रखा था। राम ने रावण को मारकर धरती पर मर्यादाओं से भरे ईश्वरीय समाज की स्थापना की। कृष्ण के जन्म के पहले ही उनके मामा कंस ने उनके माता-पिता को जेल में डाल दिया था। राजा कंस ने उनके सात भाईयों को पैदा होते ही मार दिया। कंस के घोर अन्याय का कृष्ण को बचपन से ही सामना करना पड़ा। कृष्ण ने बचपन में ही ईश्वर की इच्व्छा तथा आज्ञा को पहचान लिया और उनमें अपार ईश्वरीय ज्ञान व ईश्वरीय शक्ति आ गई और उन्होंने बाल्यावस्था में ही कंस का अंत किया। इसके साथ ही उन्होंने कौरवों के अन्याय को खत्म करके धरती पर न्याय की स्थापना के लिए महाभारत के युद्ध की रचना की। बचपन से लेकर ही कृष्ण का सारा जीवन संघर्षमय रहा किन्तु धरती और आकाश की कोई भी शक्ति उन्हें प्रभु के कार्य के रूप में धरती पर न्याय आधारित साम्राज्य स्थापित करने से नहीं रोक सकी। बुद्ध ने मानवता की मुक्ति तथा ईश्वरीय प्रकाश का मार्ग ढूंढ़ने के लिए राजसी भोगविलास त्याग दिया और अनेक प्रकार के शारीरिक कष्ट झेले। अंगुलिमाल जैसे दुष्टों ने अनेक तरह से उन्हें यातनायें पहुँचाई किन्तु धरती और आकाश की कोई भी शक्ति उन्हें दिव्य मार्ग की ओर चलने से रोक नहीं पायी। ईशु को जब सूली दी जा रही थी तब वे परमपिता परमात्मा से प्रार्थना कर रहे थे – हे परमात्मा! तू इन्हें माफ कर दे जो मुझे सूली दे रहे हैं क्योंकि ये अज्ञानी हैं अपराधी नहीं। ईशु ने छोटी उम्र में ही प्रभु की इच्छा तथा आज्ञा को पहचान लिया था फिर धरती और आकाश की कोई शक्ति उन्हें प्रभु का कार्य करने से रोक नहीं सकी। जिन लोगों ने ईशु को सूली पर चढ़ाया देखते ही देखते उनके कठोर हृदय पिघल गये। सभी रो-रोकर अफसोस करने लगे कि हमने अपने रक्षक को क्यों मार डाला? मोहम्मद साहब की प्रभु की इच्छा और आज्ञा को पहचानते हुए मूर्ति पूजा छोड़कर एक ईश्वर की उपासना की बात करने तथा अल्लाह की इच्छा तथा आज्ञा की राह पर चलने के कारण मोहम्मद साहब को मक्का में अपने नाते-रिश्तेदारों, मित्रों तथा दुष्टों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा और वे 13 वर्षों तक मक्का में मौत के साये में जिऐ। जब वे 13 वर्ष के बाद मदीने चले गये तब भी उन्हें मारने के लिए कातिलों ने मदीने तक उनका पीछा किया। मोहम्मद साहब की पवित्र आत्मा में अल्लाह (परमात्मा) के दिव्य साम्राज्य से कुरान की आयतें 23 वर्षों तक एक-एक करके नाजिल हुई। नानक को ईश्वर एक है तथा ईश्वर की दृष्टि में सारे मनुष्य एक समान हैं, के दिव्य प्रेम से ओतप्रोत सन्देश देने के कारण उन्हें रूढ़िवादिता से ग्रस्त कई बादशाहों, पण्डितों और मुल्लाओं का कड़ा विरोध सहना पड़ा। नानक ने प्रभु की इच्छा और आज्ञा को पहचान लिया था उन्होंने जगह-जगह घूमकर तत्कालीन अंधविश्वासों, पाखण्डों आदि का जमकर विरोध किया। बहाई धर्म के संस्थापक बहाउल्लाह को प्रभु का कार्य करने के कारण 40 वर्षों तक जेल में असहनीय कष्ट सहने पड़ें। जेल में उनके गले में लोहे की मोटी जंजीर डाली गई तथा उन्हें अनेक प्रकार की कठोर यातनायें दी र्गइं। जेल में ही बहाउल्लाह की आत्मा में प्रभु का प्रकाश आया। बहाउल्लाह की सीख है कि परिवार में पति-पत्नी, पिता-पुत्र, माता-पिता, भाई-बहिन सभी परिवारजनों के हृदय मिलकर एक हो जाये तो परिवार में स्वर्ग उतर आयेगा। इसी प्रकार सारे संसार में सभी के हृदय एक हो जाँये तो सारा संसार स्वर्ग समान बन जायेगा। अर्जुन को कृष्ण के मुँह से निकले परमात्मा के पवित्र गीता के सन्देश से ज्ञान हुआ कि ‘कर्तव्य ही धर्म है’। न्याय के लिए युद्ध करना ही उसका परम कर्तव्य है। फिर अर्जुन ने अन्याय के पक्ष में खड़े अपने ही कुल के सभी अन्यायी योद्धाओं तथा 11 अक्षौहणी सेना का महाभारत युद्ध करके विनाश किया। इस प्रकार अर्जुन ने धरती पर प्रभु का कार्य करते हुए धरती पर न्याय के साम्राज्य की स्थापना की। माता देवकी ने अपनी आंखों के सामने एक-एक करके अपने सात नवजात शिशुओं की हत्या अपने सगे भाई कंस के हाथों होते देखी और अपनी इस हृदयविदारक पीड़ा को प्रभु कृपा की आस में चुपचाप सहन करती रही। देवकी ने अत्यन्त धैर्यपूर्वक अपने आंठवे पुत्र कृष्ण के अपनी कोख से उत्पन्न होने की प्रतीक्षा की ताकि मानव उद्धारक कृष्ण का इस धरती पर अवतरण हो सके तथा वह धरती को अपने भाई कंस जैसे महापापी के आतंक से मुक्त करा सके तथा धरती पर न्याय आधारित ईश्वरीय साम्राज्य की स्थापना हो।  मीराबाई कृष्ण भक्ति में भजन गाते हुए मग्न होकर नाचने-गाने लगती थी जो कि उनके राज परिवार को अच्छा नहीं लगता था। इससे नाराज होकर मीरा को राज परिवार ने तरह-तरह से डराया तथा धमकाया। उनके पति राणाजी ने कहा कि तू मेरी पत्नी होकर कृष्ण का नाम लेती है। मैं तुझे जहर देकर जान से मार दूँगा। मीरा ने प्रभु की इच्छा और आज्ञा को पहचान लिया था उन्होंने अपने पति से कहा कि पतिदेव यह शरीर तो विवाह होने के साथ ही मैं आपको दे चुकी हूँ, आप इस शरीर के साथ जो चाहे सो करें, किन्तु आत्मा तो प्रभु की है, उसे यदि आपको देना भी चाँहू तो कैसे दे सकती हूँ? यह संसार का कितना बड़ा अजूबा है कि असुर प्रवृत्ति के तथा ईश्वर के घोर विरोधी दुष्ट राजा हिरण्यकश्यप के घर में ईश्वर भक्त प्रहलाद का जन्म हुआ। उसके दुष्ट पिता ने प्रहलाद को पहाड़ से गिराकर, जहर देकर तथा आग में जलाकर तरह-तरह से मारने का प्रयास किया। प्रहलाद ने अपने पिता हिरण्यकष्यप से कहा कि पिताश्री यह शरीर आपका है इसका आप जो चाहे सो करें, किन्तु आत्मा तो परमात्मा की है। इसे आपको देना भी चाहूँ तो कैसे दे सकता हूँ? प्रहलाद के चिन्तन में भगवान आ गये तो हिरण्यकश्यप जैसे ताकतवर राजा का अंत नृसिंह अवतार के द्वारा हो गया। हनुमान जी ने परमात्मा की इच्छा तथा आज्ञा को पहचान लिया और उनके चिन्तन में भगवान आ गये तो वह एक छलाँग में मीलों लम्बा समुद्र लांघकर सोने की लंका पहुँच गये। हनुमान में यह ताकत परमात्मा की इच्छा तथा आज्ञा को पहचान लेने से आ गयी। प्रभु भक्त हनुमान ने पूरी लंका में आग लगाकर रावण को सचेत किया। हनुमान के चिन्तन में केवल एक ही बात थी कि प्रभु का कार्य किये बिना मुझे एक क्षण के लिए भी विश्राम नहीं करना है। हनुमान ने बढ़-चढकर प्रभु राम के कार्य किये। हनुमानजी की प्रभु भक्ति यह संदेश देती है कि उनका जन्म ही परमात्मा के कार्य के लिए हुआ था। गाँधीजी ने जीवन-पर्यन्त प्रभु की इच्छा तथा आज्ञा को पहचान कर प्रभु का कार्य करते हुए सारे समाज की सेवा की। गाँधी जी ने अनेक यातनायें धैर्यपूर्वक सहन की तथा अपनी सेवा भावना तथा सत्य एवं अहिंसा के बल पर देश को आजाद कराया। मदर टेरेसा अपनी दया, करूणा तथा संवेदना से ओतप्रोत महान सेवा कार्यों के कारण सारे संसार में सदा-सदा के लिए अमर हो गई। वह सारे जगत् की करूणामयी मदर (माता) बन गई। मदर टेरेसा द्वारा स्थापित चेरिटी संस्थायें आज लाखों असहाय बच्चों, वृद्धों तथा बीमारों की व्यापक रूप से सेवा कर रही हैं। अब्राहम लिंकन एक गरीब मोची के घर अमेरिका में पैदा हुए थे। प्रभु की इच्छा और आज्ञा को पहचान कर जीवन में भारी असफलताओं तथा कष्टों का सामना करते हुए अमेरिका के सबसे लोकप्रिय राष्ट्रपति बने। उन्होंने सारे विश्व से गोरे-काले का भेद मिटा दिया। अब्राहम लिंकन की मानवीय विचारों की आंधी में विश्व से अनेक राजाओं के राज्य खत्म हो गये तथा उसके स्थान पर उन्होंने जनतंत्र अर्थात् जनता का राज्य, जनता के द्वारा तथा जनता के लिए स्थापित किया। उन्होंने समाज की भलाई के लिए अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया। अब्राहम लिंकन को आज भी सारा विश्व बड़े ही सम्मान तथा आदर की दृष्टि से देखता है।परिवार तथा विद्यालय दोनों को मिलकर बच्चों को भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक शिक्षाओं का संतुलित ज्ञान कराना चाहिए। बच्चों को यह बतलाये कि ईश्वर एक है, धर्म एक है तथा मानव जाति एक है। इसके साथ ही हमें बच्चों को बाल्यावस्था से ही यह संकल्प कराना चाहिए कि एक दिन दुनियाँ एक करूँगा, धरती स्वर्ग बनाऊँगा। विश्व शान्ति का सपना एक दिन सच करके दिखलाऊँगा। परमात्मा की ओर से अवतरित पवित्र पुस्तकों गीता, त्रिपटक, बाईबिल, कुरान, गुरू ग्रन्थ साहिब, किताबे-अकदस का ज्ञान सारी मानव जाति के लिए हंै। यदि बच्चे बाल्यावस्था से ही सारे अवतारों की मुख्य शिक्षाओं को तथा महापुरूषों के प्रभु की राह में उठाये गये कष्टों से शिक्षा ग्रहण कर लें तो वे टोटल क्वालिटी पर्सन बन जायेंगे। इस नयी सदी में विश्व में एकता तथा शान्ति लाने के लिए आज के ज्ञान तथा बुद्धिमत्ता वाले टोटल क्वालिटी पर्सन (पूर्णतया गुणात्मक व्यक्ति) की आवश्यकता है।

पूरा समाज मेरा परिवार

स्कूल उनके गांव से करीब दस किलोमीटर दूर था। गांव में न सड़क थी, न बिजली। दूर-दूर तक कोई दुकान नहीं थी। गांव में सिर्फ 30 घर थे। कल्याणसुंदरम गांव के अकेले बच्चे थे, जिन्हें स्कूल जाने का मौका मिला। इसके लिए रोज दस किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था।
यह कहानी तमिलनाडु के एक छोटे गांव मेलाकारूवेलनगुलम की है। यह तिरूनेलवेली जिले में है। कल्याणसुंदरम इसी गांव में पले-बढ़े। एक साल थे जब उनके पिता की मौत हो गई। मां ने उन्हंे पाला। पति के निधन के बाद बेटे को पढ़ा-लिखाकर नेक इंसान बनाना उनके जीवन का एकमात्र मकसद बन गया। कल्याणसुंदरम बताते हैं, मुझे अकेले स्कूल जाना अच्छा नहीं लगता था। मैंने साथी बच्चों से पूछा, वे स्कूल क्यों नहीं जाते, तो जवाब मिला कि उनके परिवार के पास स्कूल की फीस देने के पैसे नहीं हैं। मैं इस बात से बहुत दुखी था। मैं उनकी मदद करना चाहता था, पर तब मैं बहुत छोटा था। गांव में बिजली नहीं थी, लिहाजा मां दीये की रोशनी में काम करती थीं। जब बेटा स्कूल जाने लगा, तो वह घर में लैंप ले आईं, ताकि बेटे को पढ़ाई में दिक्कत न हो। कल्याणसुंदरम बताते हैं, मां ने तीन बातें सिखाई। कभी लालच मत करो, अपनी कमाई का कुछ हिस्सा दान करो और हर दिन एक नेक काम करो। मां की बात मन में घर कर गई।
तब वह 16 साल के थे। उनकी आवाज लड़कियों जैसी पतली थी। दोस्त चिढ़ाने लगे। धीरे-धीरे वह हीन भावना के शिकार हो गए। आत्महत्या का ख्याल आने लगा। एक सुबह एक पत्रिका में उन्होंने प्रेरक लेख पढ़ा और लेखक से मिलने पहुंच गए। लेखक से उन्होंने कहा, मेरी आवाज लड़कियों जैसी है। सब चिढ़ाते हैं। मन करता है कि जान दे दूं। यह सुनकर लेखक महोदय मुस्कराए और कहा, इस बात की फिक्र मत करो कि तुम कैसा बोलते हो? कुछ ऐसा करो कि लोग मुम्हारे बारे में अच्छा बोलने लगे। यह सुनकर उनके मन की उदासी खत्म हो गई। स्कूली पढ़ाई के बाद वह शहर आ गए। स्नातक में तमिल भाषा को मुख्य विषय चुना, फिर इतिहास में एमए किया। शहर में भी मां की सीख याद रही। काॅलेज के दिनों से ही वह आस-पास के बच्चों की पढ़ाई में मदद करने लगे। बात 1962 की है। उन दिनों वह मद्रास यूनिवर्सिटी से लाइब्रेरी साइंस की पढ़ाई कर रहे थे। भारत-चीन के बीच युद्ध चल रहा था। कल्याणसुंदरम बताते हैं, मैंने रेडियो पर नेहरू जी का संदेश सुना। वह देशवासियों से रक्षाकोष में दान देने की अपील कर रहे थे। मैं तुरंत मुख्यमंत्री कामराज के पास गया और अपने गले से सोने की जंजीर उतारते हुए कहा- आप इसे कोष में जमा कर लीजिए। शायद यह सैनिकों के काम आ जाए। मुख्यमंत्री इतना प्रभावित हुए कि मई दिवस पर कल्याणसुंदरम को सम्मानित किया। पढ़ाई बाद यूनिवर्सिटी में लाइब्रेरियन की नौकरी मिल गई। उनका जीवन सादा था। साधारण से घर में रहना, दो जोड़ी कपड़े में गुजारा, पैदल चलना और खुद पकाकर खाना। जरूरतें बहुत कम थीं, लिहाजा वेतन का कुछ ही हिस्सा खर्च कर पाते थे। बाकी पैसे बच्चों के लिए दान करने लगे। बाद में मदद करने का जुनून इस कदर चढ़ा कि वह पूरा वेतन दान करने लगे। नौकरी के पूरे 35 साल यह सिलसिला चला। कल्याणसुंदरम कहते हैं, वेतन के पैसे से गरीब बच्चों को स्कूल जाता देखकर मन को बड़ा सुकून मिलता था। यह वाकया 1990 का है। उन्हें यूजीसी से एक लाख रूपया एरियर मिला। उन्होंने सोचा, इस पैसे का मैं क्या करूंगा? वह डीएम कार्यालय पहुंचे और जिलाधिकारी को पूरी राशि देते हुए कहा कि आप इसे अनाथ बच्चों के कल्याण पर खर्च कीजिए। डीएम के जरिये यह बात मीडिया तक पहुंची। पहली बार पूरे शहर को इस दानवीर के बारे मंे पता चला। यह खबर सुपरस्टार रजनीकांत तक भी पहुंची। वह उनसे मिलने पहंुचे। अभिनेता ने उन्हें बतौर पिता गोद लेने का एलान किया। वह कल्याणसुंदरम को अपने साथ घर ले जाना चाहते थे, पर वह राजी नहीं हुए। साल 1998 में रिटायरमेंट के बाद उन्होंने पालम नाम की संस्था बनाई। पीएम के दस लाख रूपये संस्था को दान कर दिए। हर महीने की पेंशन भी दान में जाने लगी। खुद के गुजारे के लिए वह होटल में वेटर का काम करने लगे। कल्याणसुंदरम कहते हैं, मैंने शादी नहीं की। मेरी जरूरतें बहुत कम हैं। अपने गुजारे के लिए मैं होटल में काम करता हूं। मेरा खर्च निकल जाता है। मुझे पेंशन की जरूरत नहीं है। वह अपनी सारी पैतृक संपत्ति सामाजिक संस्था को दान कर चुके हैं। उन्होंने मरने के बाद अपनी आंखें और शरीर दान देने का एलान भी किया है। संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें 20वीं सदी के बेमिसाल लोगों में शुमार किया। एक अमेरिकी संस्था ने उन्हें ‘मैन आॅफ द मिलेनियम’ अवाॅर्ड से सम्मानित किया। इस मौके पर उन्हें बतौर इनाम 30 करोड़ रूपये मिले। यह पैसा भी उन्होंने दान कर दिया। कल्याणसुंदरम कहते हैं, इस दुनिया में हर इंसान मृत्यु के बाद खाली हाथ जाता है। फिर संपत्ति जोड़ने की होड़ कैसी? दूसरों के लिए जियो, बड़ा सुकून मिलेगा।
प्रस्तुति – मीना त्रिवेदी
साभार – हिन्दुस्तान दिनांक 7 मई 2017

भूख और धर्म

– डॉ. जगदीश गाँधी, प्रबन्धक-संस्थापक, सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
संविधान ने प्रत्येक मनुष्य को जीने का अधिकार प्रदान किया है। इस संवैधानिक अधिकार के अनुकूल कल्याणकारी राज्य में सबसे पहले सभी नागरिकों को दो वक्त का भोजन सुलभ होना चाहिए। जीने के लिए सबसे जरूरी है कि आदमी का पेट भरा रहे। यह हर जीव-जंतु के शरीर की सबसे बड़ी मांग है। इसके बिना जीवन नहीं जीया जा सकता है। बुद्ध के शिष्य एक व्यक्ति को लेकर आए और उसे धर्म-तत्व समझाने की प्रार्थना की, क्योंकि उनके उपदेशों को वह समझ नहीं पा रहा था। बुद्ध ने कहा, पहले इसे खाने को दो। यह भूखा है। पेट भर जाने के बाद समझेगा धर्म। जीवन के लिए सबसे आवश्यक है सांस, जो प्रकृति से मिलती है। फिर है पानी, जो प्रकृति की ही देन है। तीसरी आवश्यकता है आहार। यह भी प्रकृति ने दिया है। मगर जिस जमीन पर अनाज पैदा होता है, आदमी ने व्यवस्था के नाम पर उस पर स्वामित्व की विभाजक रेखा खींच दी। उसकी उपज को भी संपत्ति और क्रय-विक्रय की वस्तु बनाकर उस पर व्यक्तिगत मिल्कियत की मुहर लगा दी। मनुष्य की व्यवस्था ने प्रकृति की हर चीज का बंटवारा किया और उसका मालिक होने का हक जता दिया। धीमे-धीमे आवश्यकता गौण व मालिकाना पकड़ मजबूत हो गई। इससे एक तरफ समाज में अभाव, तो दूसरी तरफ अति-भाव की विषम स्थिति बन गई। रोटी के संसार को दो टुकड़ों में बांट दिया गया। एक टुकड़ा रोटी को सर्वोच्च मूल्य मानकर जीवन के सारे परम सत्यों को नकार रहा है, तो दूसरा उनकी दुहाई देकर रोटी के सर्वजन्य अधिकार को नकार रहा है। महावीर कहते हैं, ह्यजिजीविषा सार्वभौम सत्ता है। जीने की इच्छा सबकी है। अत: जीवन का अधिकार भी सबका है। उन्होंने कहा, अच्छा हो कि संयम से हम खुद को नियंत्रित करें, नहीं तो दूसरे हमें बंधन, बलात नियंत्रण, वध और रक्तपात द्वारा नियंत्रित कर देंगे। ईसा मसीह भक्तों को सलाह देते थे, केवल रोटी के बूते जिंदगी नहीं चलती। किसी ने टिप्पणी की, हमें तो वह भी नसीब नहीं होती। कहते है यह सुन कर ईशु की आंखें भर गयी। दो जून खाए बगैर इंसान का कहां गुजारा, प्रभु का नाम लेना हो तब भी। किसी ने कहा है कि भूखे पेट भजन नहीं होता प्रभु। लाजिमी है, भूख की तड़प और रोटी नसीब नहीं होने की पीड़ा सभी देशों में मुखर हंै। बेटी ब्याहते वक्त देखा जाता रहा है कि होने वाले दामाद का खेत, नौकरी या धंधा हो ताकि वह बेटी को खिला सके। एक न्यायपूर्ण शासन व्यवस्था में सबसे पहले सभी नागरिकों को दो वक्त भोजन सुलभ होना चाहिए।

आध्यात्मिक चेतना के अभाव में सुख संभव नहीं

– डॉ. भारती गाँधी, शिक्षाविद्
जिस प्रकार से किसी भी देश को चलाने के लिए संविधान की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार से मनुष्य को अपना निजी जीवन चलाने के लिए व अपना सामाजिक जीवन चलाने के लिए धर्म की आवश्यकता है। अगर वह इसमें सही प्रकार से सामंजस्य करता है तो वह आध्यात्मिक कहलाता है। अध्यात्म का मतलब यह नहीं होता कि दुनियाँ से बिलकुल दूर जाकर के जंगल में पहाड़ों की कन्दराओं में जाकर बैठ जाओं। धर्म का मतलब होता है अपने जीवन को इस प्रकार से संचालित करना कि मानव अपने जीवन के उद्देश्य को प्राप्त कर सके। मानव जीवन का उद्देश्य है प्रभु को प्राप्त करना और उसकी शिक्षाओं पर चलना। इस प्रकार जैसे-जैसे हमारे जीवन में धर्म आता जायेंगा वैसे-वैसे हम आध्यात्मिक होते जायेंगे।आध्यात्मिक चेतना के अभाव में मनुष्य कभी भी सुखी नहीं रह सकता है। इस जगत में केवल आध्यात्मिक चेतना वाला व्यक्ति ही सुखी रह सकता है। इसके बारे में हमें केवल अंदरूनी ज्ञान होना चाहिए। हमें दिव्य ज्ञान होना चाहिए। हमारी आँखें सदैव खुली होनी चाहिए। हमारे कान सदैव खुले होने चाहिए। महात्मा गाँधी ने भी कहा था कि मैं अपने कमरे की खिड़कियों को हमेशा खुला रखता हूँ। पता नहीं पूरब या पश्चिम से, उत्तर या दक्षिण से कहाँ से मेरे को अच्छे विचार मिल जायें। वास्तव में अच्छे विचार वही होते हैं जो कि धर्म से पोषित होते हैं। जो विचार धर्म के अलावा होते हैं, वे टिकाऊ नहीं होते। उनका कोई अस्तित्व नहीं होता। वे दुनियाँ में जम नहीं पाते हैं। सभी धर्मों में दो बातें विशेष रूप से बताई गई हैं। सनातन पक्ष तथा सामाजिक पक्ष। सनातन पक्ष में बताया गया है कि हमें सदैव सत्य बोलना है। हमें सदैव प्रेम करना है। हमें सदैव न्याय करना है। हमें सदैव दूसरों की सेवा करनी हैं, इत्यादि-इत्यादि। जबकि सामाजिक पक्ष में हमें बताया गया है कि हम जिस युग में रहते हैं, हमें उस युग की समस्याओं को समझना है। इन समस्याओं के समाधान हेतु उस युग के अवतार द्वारा जो शिक्षाएं दी गई हैं, उन शिक्षाओं पर हमें चलना है। प्रत्येक युग का अवतार उस युग की समस्याओं के समाधान हेतु परमात्मा द्वारा भेजा जाता है। वह युग अवतार हमें उस युग की समस्याओं को समझ करके उसके समाधान के रूप में हमें युग धर्म देता है। इस युग का धर्म है, भगवान को पहचानना। उनका ज्ञान प्राप्त करना और उनकी बताई हुई सामाजिक शिक्षाओं पर चलना। इस युग की सामाजिक शिक्षा है ‘एकता’। एकता की शुरूआत परिवार से होती है। इसीलिए कहा भी गया है कि पारिवारिक एकता के अभाव में विश्व एकता की कल्पना तक नहीं की जा सकती।

सृष्टि के रचनाकार परमपिता परमात्मा का अस्तित्व

– डॉ. जगदीश गांधी
शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
आज मानव जाति अनेक समस्याओं, कुरीतियों तथा मूढ़ मान्यताओं से पीड़ित तथा घिरा हुआ है। मनुष्य परमात्मा के दर्शन भौतिक आंखों से करना चाहता है। आज धर्म का स्थान बाहरी कर्म-काण्डों ने ले लिया है। हम सभी जानते हैं कि अध्यात्म भारतीय संस्कृति का प्राण तत्व है। अध्यात्म अनुभव का क्षेत्र है और इसकी प्रक्रियाओं व वैज्ञानिक प्रयोगों को प्रत्यक्ष दिखाया नहीं जा सकता, जैसे- हम वायु को देख नहीं सकते, केवल अनुभव कर सकते हैं, ठीक उसी तरह अध्यात्म के वैज्ञानिक प्रयोग स्थूलजगत में देखे नहीं जा सकते, केवल उनके परिणामों को देखा जा सकता है। अध्यात्म चेतना का विज्ञान है। भौतिक विज्ञान की सीमाएँ जहाँ समाप्त होती हैं, वहाँ से अध्यात्म विज्ञान की शुरूआत होती है। इस सृष्टि में पदार्थ और चेतना अर्थात प्रकृति व पुरूष, दोनों साथ-साथ मिलकर कार्य करते हैं। जैसे हमारे शरीर में जब तक पुरूष रूपी जीवात्मा है तब तक प्रकृति के पंचतत्वों से बना यह शरीर जीवित है। जीवात्मा के शरीर से पृथक होते ही पंचतत्वों से बना यह शरीर निर्जीव व निष्क्रिय हो जाता है। आज के वर्तमान समय में विज्ञान जहाँ भौतिक जगत का प्रतिनिधित्व कर रहा है, वहीं अध्यात्म चेतना जगत का प्रतिनिधित्व कर रहा है। विज्ञान वह है, जो इंद्रियों के द्वारा जाना-समझा जाता है; जबकि अध्यात्म विश्वास, समर्पण व आत्मानुभूति द्वारा जाना जाता है। इसे वास्तव में चेतना का विज्ञान कह सकते हैं और इस चेतना का जितना विकास होगा, हमारी प्रकाशित बुद्धि व विवेक उसी मात्रा में जाग्रत होती जायेगी। जीवन को समग्र रूप से जानने व जीवन जीने के विज्ञान को भी अध्यात्म कह सकते हैं। अध्यात्म व विज्ञान, दोनों का ही उद्देश्य सत्य को जानना है, लेकिन दोनों एकदूसरे के बिना अधूरे हैं। यदि विज्ञान अध्यात्म को नकारता है, उसके निर्देशन व मार्गदर्शन की अवज्ञा करता है तो यह विनाशकारी होगा और यदि अध्यात्म विज्ञान का सहारा नहीं लेता तो इसे प्रामाणिक रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता और यह अंधविश्वास व मूढ़ मान्यताओं के जैसा प्रतीत होगा। हमारा मानना है कि यदि अध्यात्म और विज्ञान दोनों मिलकर आगे बढ़े तो निश्चित रूप से अपने लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं और सृष्टि के लिए कल्याणकारी व मानव-विकास के पथ को प्रशस्त कर सकते हैं। यदि इन दोनों ने मिलकर कार्य किया तो भविष्य में ‘वैज्ञानिक अध्यात्मवाद’ एक नूतन दर्शन के रूप में प्रतिष्ठित होगा; जिससे मानव जीवन का परम कल्याण संभव है। परमात्मा का अनुभव कहने की बात नहीं है, बस, प्रतिक्षण उसे जिया ही जा सकता है। उस परम अनुभूति में स्वयं को डुबोया जा सकता है, सराबोर किया जा सकता है। लहर सागर में है और सागर भी लहर में है, फिर भी इस कथन में एक रहस्य है- पूरी की पूरी लहर तो सागर में हैं, पर पूरा का पूरा सागर लहर में नहीं है। अनुभव-खासतौर पर परम सत्य का अनुभव सागर जैसा है और अभिव्यक्ति तो बस, लहर जैसी है, जो थोड़ी सी खबर लाती है, लेकिन अनंत गुना अनुभव का सच पीछे छूट जाता है। वैसे भी शब्द परमात्मा के अस्तित्व को नहीं बाँध सकते। इनकी सीमा में अनंत नहीं समा सकता। शब्द तो बस, छोटी-छोटी खिड़कियों की तरह हैं; जबकि परमात्मा के अस्तित्व के अनुभव का, सत्य के स्वरूप व प्रेम का आकाश अनंत है, असीम है।

दुनिया को बेहतर लौटाने की कोशिश होनी चाहिए

प्रदीप कुमार सिंह ‘पाल’
शैक्षिक एवं वैश्विक चिन्तक
राजस्थान के बाड़मेर के रहने वाले ओम प्रकाश डूडी का चयन एमबीबीएस में हुआ था। वह पढ़ाई के लिए महाराष्ट्र के शोलापुर मेडिकल कालेज पहुंचे। यहां अपनी सहपाठी स्नेहा से उनका मिलना हुआ और दोनों में प्यार हो गया। 2006 में डॉ. ओम की तबीयत खराब हुई तथा डाक्टरों ने कहा कि उनकी किडनियां खराब हैं। 2007 में ओम की किडनी का ट्रांसप्लांट हुआ जो उसकी मां ने दी थी। स्नेहा ने 2009 में डा. ओम से लव मैरिज कर ली। पति की दूसरी किडनी खराब होने के कारण डॉ. स्नेहा ने तय किया कि अब अपने सुहाग पर आए संकट के लिए वह खुद आगे आएंगी। स्नेहा ने 6 फरवरी 2017 को अपने पति डॉ. ओमप्रकाश को किडनी दे दी। स्नेहा की एक किडनी ओम के शरीर में है। यह पति-पत्नी के प्यार के एक अनुकरणीय मिसाल है। मध्य प्रदेश के दमोह में गरीबी के कारण जब लक्ष्मी प्रसाद मिस्त्री ‘रमा’ की पत्नी खिलौना बहू ने तेज बुखार के कारण दम तोड़ दिया, तो उन्होंने पत्नी के अंतिम संस्कार के बाद संध्या बेला में उसकी याद में कुछ ऐसा करने की ठानी की वह हमेशा हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई। पत्नी की याद में हटा के मुक्तिधाम में वर्ष 1921 को बनाया गया यह स्मारक पति का पत्नी के प्रति अपार प्रेम दर्शाता है। पेशे से निर्माण मिस्त्री रमा ने इस स्मारक के चारों ओर हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू और संस्कृत भाषा में पंक्तियां अंकित की हैं। वहीं ग्वालियर में पत्नी की रोज-रोज की प्रताड़ना से तंग आकर तलाक के लिए अदालत पहुंचे पति ने वेलेन्टाइन डे से एक दिन पहले तीन बच्चों की खातिर पत्नी से समझौता कर लिया। आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती ने उन्नीसवीं शताब्दी में स्त्रियों की दुर्दशा देखकर इस विषय का अत्यन्त गहन अध्ययन किया। उनकी प्रेरणा से नारी शिक्षा और सुरक्षा के प्रति समर्पित डीएवी आंदोलन आज भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इमरान खान का जन्म राजस्थान के अलवर जिले के खरेदा गांव में हुआ था। वह स्कूल के दिनों से ही वैज्ञानिक बनना चाहते थे। वह वैज्ञानिक तो नहीं बन सके, लेकिन वह टीचर बन गये। दो वर्षीय टीचिंग कोर्स करने के बाद वर्ष 1999 में सरकारी स्कूल में टीचर की नौकरी मिल गई। इमरान खान ने हिन्दी भाषा में शैक्षिक ऐप्स बनाए हैं। उनका मानना है कि अपनी भाषा में पढ़ने में बच्चे सहज महसूस करते हैं और वह उनके लिए हिन्दी में शैक्षिक ऐप्स बनाते हैं। अब तक वह 65 शैक्षिक ऐप्स और सौ से अधिक वेबसाइटें बना चुके हैं। लाखों बच्चे उनके शैक्षिक ऐप्स तथा वेबसाइटों से अपने ज्ञान का बेहतर बनाने का लाभ उठा रहे हंैं। सफलता न तो समय की मोहताज होती है और न ही उम्र की। दुनिया में आज बहुत से ऐसे युवा उद्यमी हंै, जिन्होंने स्कूल के दिनों में अपना बिजनेस शुरू किया और देखते ही देखते दुनिया के शीर्ष बिजनेस मैन की सूची में शामिल हो गए। मंजिल उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता हौंसलों से उड़ान होती है। ये पंक्तियां उन लोगों को समर्पित हैं जिन्होंने जीवन के संघर्ष में विजयी होकर विभिन्न परिस्थितियों में नवीन सृजन किया है। ऐसे लोगों ने सामने आकर स्वयं का और समाज का नेतृत्व किया है। इन युवा पीढ़ी में सोशल मीडिया फाउंडर बॉबी मर्फी, ब्रांडिंग किंग फरयाद एसिडवाला, मेडिकल प्रोफेशनल एलिजाबेथ एनी होम्स, ऐप डेवलपर रॉबर्ट मोजाह ब्रिजेज, कुकिंग एक्सपर्ट लीजा मैरी, टॉप कंसल्टेंट कैमरून जॉनसन आदि शामिल हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी जावेद अख्तर साहित्य के क्षेत्र में एक जाना-माना नाम हैं। बेहद-चढ़ाव भरी जिंदगी जीने वाले जावेद अख्तर ने जीवन की सच्चाइयों को बहुत करीब से देखा, सुना तथा जाना है। कभी अच्छे या बुरे की शिकायत न करने वाले जावेद अख्तर हमेशा दुनिया को बेहतर लौटाने की कोशिश करते रहे हैं। बुलंदियों के इस दौर में भी उनकी सहानुभूति पिछड़े, गरीब लोगों के प्रति रही है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में जन्मे जावेद अख्तर के पिता जाने-माने प्रगतिशील कवि व माता उर्दू की लेखिका तथा शिक्षिका थीं।कश्मीर के जिला बलगाम के युवक नजीर अहमद लोन ने न कौम को आड़े आने दिया और न ही इलाकाई
संबंधों को। यहां तक कि भ्रष्ट अफसरों ने नजीर पर आतंकवादी होने का झूठा आरोप तक लगा कर इस कश्मीरी युवक को दबाने की कोशिश की। अपनी ही कौम के लोगों ने धमकाया-बरगलाया लेकिन यह आठवीं पास युवक नजीर अहमद लोन नहीं रूका। कश्मीर घाटी के गांव से आरटीआई लगाई और खोलता चला गया अपनी ही कौम के अफसरों की पोल। शॉल बेचकर अपने परिवार का गुजर-बसर करने वाले नजीर बताते हैं कि बाहर के दुश्मनों से लड़ना कई बार आसान होता है लेकिन अपने ही लोगों से लड़ना बहुत कठिन होता है। भारत ने अंतरिक्ष में दुनिया को पछाड़ने का कीर्तिमान बनाया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने एक ही रॉकेट से रिकॉर्ड 104 उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण कर इतिहास रचा दिया। इसरो को सिर्फ एक सफल अंतरिक्ष एजेंसी ही नहीं, वह पूरे देश के लिए एक रोल मॉडल है। इसरो के कामकाज में हमें जो जज्बा दिखाई देता है, आगे बढ़ने के लिए पूरे देश को उसी जज्बे की जरूरत है। इन भारतीय वैज्ञानिकों की जितनी प्रशंसा की जाये वह कम हैं। वह दिन दूर नहीं जब इंसान पृथ्वी के बाहर ब्रह्माण्ड में किसी ग्रह में बसने तथा जीवन की खोज करने में सफल होगा। मनुष्य के रूप में हमारा धरती पर जन्म होना ही अपने आपमें सबसे बड़ा सौभाग्य है। इसके अलावा इस शरीर में जीवित रखने वाली सांस का चलना सबसे बड़ा आश्चर्य है। कुदरत ने इंसान के लिए भरपूर चीजें दे रखी हैं। एक गेहूँ का दाना बोने से कुदरत कई गुना हम वापिस करती है। कुदरत से सीख लेकर हमें दुनिया को बेहतर लौटाने की कोशिश हर पल करनी चाहिए।