Daily Archives: April 6, 2017

भूख और धर्म

– डॉ. जगदीश गाँधी, प्रबन्धक-संस्थापक, सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
संविधान ने प्रत्येक मनुष्य को जीने का अधिकार प्रदान किया है। इस संवैधानिक अधिकार के अनुकूल कल्याणकारी राज्य में सबसे पहले सभी नागरिकों को दो वक्त का भोजन सुलभ होना चाहिए। जीने के लिए सबसे जरूरी है कि आदमी का पेट भरा रहे। यह हर जीव-जंतु के शरीर की सबसे बड़ी मांग है। इसके बिना जीवन नहीं जीया जा सकता है। बुद्ध के शिष्य एक व्यक्ति को लेकर आए और उसे धर्म-तत्व समझाने की प्रार्थना की, क्योंकि उनके उपदेशों को वह समझ नहीं पा रहा था। बुद्ध ने कहा, पहले इसे खाने को दो। यह भूखा है। पेट भर जाने के बाद समझेगा धर्म। जीवन के लिए सबसे आवश्यक है सांस, जो प्रकृति से मिलती है। फिर है पानी, जो प्रकृति की ही देन है। तीसरी आवश्यकता है आहार। यह भी प्रकृति ने दिया है। मगर जिस जमीन पर अनाज पैदा होता है, आदमी ने व्यवस्था के नाम पर उस पर स्वामित्व की विभाजक रेखा खींच दी। उसकी उपज को भी संपत्ति और क्रय-विक्रय की वस्तु बनाकर उस पर व्यक्तिगत मिल्कियत की मुहर लगा दी। मनुष्य की व्यवस्था ने प्रकृति की हर चीज का बंटवारा किया और उसका मालिक होने का हक जता दिया। धीमे-धीमे आवश्यकता गौण व मालिकाना पकड़ मजबूत हो गई। इससे एक तरफ समाज में अभाव, तो दूसरी तरफ अति-भाव की विषम स्थिति बन गई। रोटी के संसार को दो टुकड़ों में बांट दिया गया। एक टुकड़ा रोटी को सर्वोच्च मूल्य मानकर जीवन के सारे परम सत्यों को नकार रहा है, तो दूसरा उनकी दुहाई देकर रोटी के सर्वजन्य अधिकार को नकार रहा है। महावीर कहते हैं, ह्यजिजीविषा सार्वभौम सत्ता है। जीने की इच्छा सबकी है। अत: जीवन का अधिकार भी सबका है। उन्होंने कहा, अच्छा हो कि संयम से हम खुद को नियंत्रित करें, नहीं तो दूसरे हमें बंधन, बलात नियंत्रण, वध और रक्तपात द्वारा नियंत्रित कर देंगे। ईसा मसीह भक्तों को सलाह देते थे, केवल रोटी के बूते जिंदगी नहीं चलती। किसी ने टिप्पणी की, हमें तो वह भी नसीब नहीं होती। कहते है यह सुन कर ईशु की आंखें भर गयी। दो जून खाए बगैर इंसान का कहां गुजारा, प्रभु का नाम लेना हो तब भी। किसी ने कहा है कि भूखे पेट भजन नहीं होता प्रभु। लाजिमी है, भूख की तड़प और रोटी नसीब नहीं होने की पीड़ा सभी देशों में मुखर हंै। बेटी ब्याहते वक्त देखा जाता रहा है कि होने वाले दामाद का खेत, नौकरी या धंधा हो ताकि वह बेटी को खिला सके। एक न्यायपूर्ण शासन व्यवस्था में सबसे पहले सभी नागरिकों को दो वक्त भोजन सुलभ होना चाहिए।

वीजा खत्म, फिर भी भारत में रह रहे 36 हजार से ज्यादा पाकिस्तानी

नई दिल्ली। भारत और पाकिस्तान के बीच पेचीदा रिश्ते पिछले कुछ सालों में और भी तल्ख हुए हैं। दो साल यानी 1 जनवरी 2014 से 31 दिसंबर 2015 के बीच जितने भी पाकिस्तानी नागरिकों को विभिन्न श्रेणियों में भारत का वीजा दिया गया था, उनमें के 28 फीसद इसके खत्म होने के बाद भी अवैध रूप से भारत में रुके रहे। यह आंकड़े केंद्र सरकार ने बुधवार को राज्यसभा में सबके सामने रखे। कुल संख्या की बात करें तो 48,510 पाकिस्तानी नागरिक जो पिछले दो साल में वीजा खत्म होने के बाद भी भारत में रुके रहे, उनमें से 25 फीसद यानी 12,200 को साल 2015 के अंत में जबरन स्वदेश भेजा गया। राज्यसभा में तारांकित प्रश्न के जवाब में केंद्रीय गृहराज्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बताया कि 36,310 पाकिस्तानी नागरिक अब भी ऐसे हैं, जिनका वीजा खत्म हो गया है और वे अब भी भारत में रह रहे हैं। साल 2014 में भारत ने 94,993 पाकिस्तानी नागरिकों के लिए वीजा जारी किया, जबकि 2015 में यह संख्या घटकर 77,543 रह गई। दूसरी तरफ रिजिजू ने बताया कि साल 2014 में 6,52,919 बांग्लादेशी नागरिकों को वीजा जारी किया गया था, जबकि साल 2015 में 7,51,044 बांग्लादेशियों को वीजा जारी किए गए।

अब कंप्यूटर प्रोग्रामर को एच-1बी वीजा नहीं देगा अमेरिका

वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने एच-1बी वीजा नियम बेहद सख्त कर दिए हैं। अब कंप्यूटर प्रोग्रामर को यह वीजा नहीं मिलेगा। सरकार ने वीजा योजना का लाभ उठाकर अमेरिकी नागरिकों से भेदभाव को लेकर कंपनियों को कड़ी चेतावनी भी दी है।
एक अक्टूबर से शुरू हो रहे अमेरिकी वित्त वर्ष के लिए वीजा आवेदन की प्रक्रिया सोमवार से शुरू हुई है। प्रक्रिया शुरू होने से पहले अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवा (यूएससीआइएस) की ओर से जारी गाइडलाइन में जो बदलाव किए गए हैं उससे भारतीय बड़ी संख्या में प्रभावित होंगे। उल्लेखनीय है कि भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी (आइटी) कंपनियों और पेशेवरों के बीच इस वीजा की बेहद मांग होती है। नई व्यवस्था के तहत सामान्य कंप्यूटर प्रोग्रामर को अब विशेषज्ञता प्राप्त पेशेवर नहीं माना जाएगा। एच-1बी कार्य वीजा विशेषज्ञता प्राप्त पेशेवरों को ही मिलती है। यूएससीआइएस ने कहा है, कोई व्यक्ति कंप्यूटर प्रोग्रामर के तौर पर काम कर सकता है। वह सूचना तकनीक कौशल और ज्ञान का इस्तेमाल किसी कंपनी को उसका लक्ष्य हासिल कराने के लिए कर सकता है। लेकिन, उसकी नौकरी उसको विशिष्ट पेशे के लिए नियुक्त कराने के लिए पर्याप्त नहीं है। अब प्रवेश के स्तर वाले कंप्यूटर प्रोग्रामर ‘विशिष्ट पेशे’ की सूची में स्थान नहीं पा सकेंगे। गाइडलाइन के मुताबिक एच-1बी वीजा के लिए आवेदन करने वाले कंप्यूटर प्रोग्रामर को अतिरिक्त जानकारी देनी होगी। उनको साबित करना होगा कि उनका काम जटिल है और इसके लिए अतिरिक्त ज्ञान और अनुभव की जरूरत है। इतना ही नहीं आवेदकों को यह भी बताना होगा कि अमेरिका को उस व्यक्ति की क्यों जरूरत है और इससे अमेरिका को क्या लाभ होगा। 1998-1999 और 2000-01 में जारी गाइडलाइन को अप्रचलित बताते हुए यूएससीआइएस ने बदलावों को जायज ठहराया है। पुरानी व्यवस्था में दो साल की डिग्री के बाद ही कंप्यूटर प्रोग्रामर इस वीजा के पात्र हो जाते थे।

कॉस्मिक रेडियेशन से बचाएगी नासा की नई डिवाइस

वाशिंगटन । अंतरिक्ष में भेजे गए क्रू की सुरक्षित वापसी के उद्देश्य से अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने एक नई डिवाइस का अविष्कार किया है। यह डिवाइस न्यूट्रॉन के विकिरण प्रदर्शन पर निगरानी रखेगी। अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर इसका परीक्षण किया जा रहा है। फास्ट न्यूट्रॉन स्पेक्ट्रोमीटर को न्यूट्रॉन की ऊर्जा का पता लगाने तथा इसे मापने के लिए डिजाइन किया गया है। अलबामा के हंट्सविले में नासा के मार्शल स्पेस फ्लाइट सेंटर के मार्क क्रिस्टल ने बताया, “अंतरिक्ष में कई प्रकार के रेडियशन होते हैं। सुपरनोवा या ब्लैक होल, एक्स-रे और अन्य कणों द्वारा निर्मित गामा किरणों का पता लगाने के लिए पहले से ही बेहतरीन उपकरण मौजूद हैं, लेकिन हमें मानवीय जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव का अनुमान लगाने के लिए न्यूट्रॉन रेडियशन का पता लगाने तथा इसका उपाय ढ़ूढ़ने की आवश्यकता है। जिस तरह से टेक्नोलॉजी आगे बढ़ रही है, उस तरह से न्यूट्रॉन की पहचान करने वाली तकनीक विकसित नहीं हो पाई है। न्यूट्रॉन रेडियशन तब होता है जब सूर्य और हमारे सौर मंडल से निकलने वाले उच्च ऊर्जा कण अन्य कणों के संपर्क में आते हैं। लेकिन आवेशित कणों में परिवर्तित होने से पहले ये केवल 13 मिनट तक ही प्रभावी रहते हैं। फास्ट न्यूट्रॉन स्पेक्ट्रोमीटर मुख्य रूप से एक निष्क्रिय टूल है, जो न्यूट्रॉन से टकराने का इंतजार करता है। इसमें प्लास्टिक स्किनटिलेटर के साथ एक एल्यूमीनियम धातु भी होती है जो डिवाइस से टकराते समय न्यूट्रॉन को धीमा कर देती है।

आइंस्टीन की चिट्ठी के लिए लगी 35 लाख की बोली

लॉस एंजिलिस। प्रख्यात जर्मन वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन की चिट्ठी के लिए 53,503 डॉलर (करीब 35 लाख रुपये) की बोली लगाई गई। यह चिट्ठी उन्होंने 1953 में एक विज्ञान अध्यापक के प्रश्नों का उत्तर देते हुए लिखी थी। आयोवा के विज्ञान अध्यापक आर्थर कंवर्स ने आइंस्टीन को दो पन्नों की प्रश्नावली भेजी थी। इसमें इलेक्ट्रोस्टेटिक थ्योरी और स्पेशल रिलेटिविटी को लेकर सवाल पूछा गया था। जवाब में आइंस्टीन के इस पत्र के लिए बोली की शुरूआत 15,000 डॉलर (करीब 9.75 लाख रुपये) से हुई। यह पत्र न्यूजर्सी के प्रिंसटन स्थित इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस्ड स्टडी के कमरा नंबर 115 से 7 सितंबर 1953 को भेजा गया था। नीलामी कराने वाली संस्था नेट डी सैंडर्स आॅक्शंस के प्रवक्ता ने बताया कि कई वर्षो तक यह पत्र कंवर्स के परिजनों के पास था। संस्था के मालिक नेट डी. सैंडर्स ने कहा कि पत्र को पढ़कर स्पष्ट है कि आइंस्टीन को कंवर्स के प्रश्न रुचिकर लगे थे और उन्होंने उदारता से उन प्रश्नों का उत्तर दिया था।

शिया बोर्ड ने 3 तलाक-गो हत्या को कहा ‘हराम’

लखनऊ। ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड की कार्यकारिणी मीटिंग में तीन तलाक का जमकर विरोध हुआ। मीटिंग में शामिल बोर्ड के पदाधिकारियों और सदस्यों ने एक स्वर से मांग रखी कि तीन तलाक की कुप्रथा को खत्म करने के लिए केंद्र सरकार सती प्रथा जैसा सख्त कानून बनाए। इस तरह का कानून बनने से हजारों विवाहित महिलाओं का जीवन बर्बाद होने से बच जाएगा। मीटिंग में लिए गए फैसलों की जानकारी ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता मौलाना यासूब अब्बास ने दी। उन्होंने बताया कि मीटिंग में फैसला किया गया कि भारत में गौ मांस खाना और गो हत्या करना हराम है।
लोहा लेने की बात नहीं
बोर्ड प्रवक्ता मौलाना यासूब अब्बास ने बताया कि इस्लाम औरतों को मर्द के बराबरी का दर्जा देता है, तो फिर यह तीन तलाक कहां से आया। हम केंद्र सरकार से मांग करने जा रहे हैं कि तलाक को लेकर ऐसा सख्त कानून बने कि बच्चियों का जीवन खराब न हो। मौलाना अब्बास ने कहा कि मैं खुद ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के जिम्मेदारों के पास गया। मैंने उनके सामने माडर्न निकाह नामा पेश किया। मैंने निवेदन किया कि वह जबरदस्ती इसे मुद्दा न बनाए। कहा इस्लाम की शुरुआत में तीन तलाक नहीं था, फिर कहां से आ गई तीन तलाक। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सवाल पर मौलाना यासूब ने कहा कि इसमें किसी से कोई लोहा लेने की बात नहीं है। कहा कि मामला सुप्रीम कोर्ट में है, हम अपना पक्ष वहां रख रहे हैं।

2035 तक सबसे ज्यादा पैदा होंगे मुस्लिम बच्चे

नई दिल्ली। एक रीसर्च के मुताबिक आने वाले सालों में मुस्लिम महिलाएं सबसे ज्यादा बच्चे पैदा करेंगी। अमेरिकी रीसर्च कंपनी प्यू रीसर्च सेंटर के अनुसार बच्चे पैदा करने के मामले में अगले 20 सालों में मुस्लिम महिलाएं पहले स्थान पर होंगी। कई सालों तक किसी भी अन्य धर्म की तुलना में ईसाई परिवारों के अंदर सबसे ज्यादा बच्चे पैदा होते थे, लेकिन अब स्थितियां बदलने जा रही हैं, 2035 तक इस मामले में मुस्लिम सबसे आगे हो सकते हैं। प्यू रीसर्च सेंटर के जनसांख्यिकी अनुमानों के मुताबिक, ’20 सालों के भीतर मुस्लिम महिलाएं ईसाई महिलाओं से ज्यादा बच्चे पैदा करेंगी।’ इसके पीछे स्पष्ट कारण दिखाई दे रहा है। हाल के सालों में विश्व में होने वाली कुल मौतों में बड़ा हिस्सा ईसाइयों का रहा और आने वाले सालों में भी यह दर जारी रहने की संभावना है, क्योंकि ईसाई जनसंख्या का बड़ा हिस्सा उम्रदराज है। इसके उलट मुस्लिमों की आबादी का बड़ा हिस्सा युवा है। ऐसे में मुस्लिमों के बच्चे पैदा होने की दर ज्यादा रहने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। बुधवार को जारी एक रिपोर्ट में आने वाले समय में दुनियाभर के धर्मों से जुड़े संभावित आंकड़ों की जानकारी दी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, ‘2030 से 2035 के बीच मुस्लिमों से पैदा होने वाले बच्चों की संख्या(22.5 करोड़), ईसाइयों से पैदा होने वाले बच्चों (22.4 करोड़) की संख्या को पार कर जाएगी। हालांकि, तब भी विश्व में ईसाई जनसंख्या ज्यादा रहेगी। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि 2055 से 2060 की अवधि में यह अंतर बढ़ेगा। इस दौरान मुस्लिमों से पैदा होने वाले बच्चों की संख्या संभवत: 23.2 करोड़ और ईसाइयों से पैदा होने वाले बच्चों की संख्या करीब 22.6 करोड़ रहने का अनुमान है। प्यू ने 2015 में आने वाले दशकों में मुस्लिमों की संख्या में तेजी से वृद्धि का अनुमान पेश किया था। बुधवार को प्यू ने कहा कि ऐसा होता दिखाई भी देने लगा है।