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आध्यात्मिक चेतना के अभाव में सुख संभव नहीं

– डॉ. भारती गाँधी, शिक्षाविद्
जिस प्रकार से किसी भी देश को चलाने के लिए संविधान की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार से मनुष्य को अपना निजी जीवन चलाने के लिए व अपना सामाजिक जीवन चलाने के लिए धर्म की आवश्यकता है। अगर वह इसमें सही प्रकार से सामंजस्य करता है तो वह आध्यात्मिक कहलाता है। अध्यात्म का मतलब यह नहीं होता कि दुनियाँ से बिलकुल दूर जाकर के जंगल में पहाड़ों की कन्दराओं में जाकर बैठ जाओं। धर्म का मतलब होता है अपने जीवन को इस प्रकार से संचालित करना कि मानव अपने जीवन के उद्देश्य को प्राप्त कर सके। मानव जीवन का उद्देश्य है प्रभु को प्राप्त करना और उसकी शिक्षाओं पर चलना। इस प्रकार जैसे-जैसे हमारे जीवन में धर्म आता जायेंगा वैसे-वैसे हम आध्यात्मिक होते जायेंगे।आध्यात्मिक चेतना के अभाव में मनुष्य कभी भी सुखी नहीं रह सकता है। इस जगत में केवल आध्यात्मिक चेतना वाला व्यक्ति ही सुखी रह सकता है। इसके बारे में हमें केवल अंदरूनी ज्ञान होना चाहिए। हमें दिव्य ज्ञान होना चाहिए। हमारी आँखें सदैव खुली होनी चाहिए। हमारे कान सदैव खुले होने चाहिए। महात्मा गाँधी ने भी कहा था कि मैं अपने कमरे की खिड़कियों को हमेशा खुला रखता हूँ। पता नहीं पूरब या पश्चिम से, उत्तर या दक्षिण से कहाँ से मेरे को अच्छे विचार मिल जायें। वास्तव में अच्छे विचार वही होते हैं जो कि धर्म से पोषित होते हैं। जो विचार धर्म के अलावा होते हैं, वे टिकाऊ नहीं होते। उनका कोई अस्तित्व नहीं होता। वे दुनियाँ में जम नहीं पाते हैं। सभी धर्मों में दो बातें विशेष रूप से बताई गई हैं। सनातन पक्ष तथा सामाजिक पक्ष। सनातन पक्ष में बताया गया है कि हमें सदैव सत्य बोलना है। हमें सदैव प्रेम करना है। हमें सदैव न्याय करना है। हमें सदैव दूसरों की सेवा करनी हैं, इत्यादि-इत्यादि। जबकि सामाजिक पक्ष में हमें बताया गया है कि हम जिस युग में रहते हैं, हमें उस युग की समस्याओं को समझना है। इन समस्याओं के समाधान हेतु उस युग के अवतार द्वारा जो शिक्षाएं दी गई हैं, उन शिक्षाओं पर हमें चलना है। प्रत्येक युग का अवतार उस युग की समस्याओं के समाधान हेतु परमात्मा द्वारा भेजा जाता है। वह युग अवतार हमें उस युग की समस्याओं को समझ करके उसके समाधान के रूप में हमें युग धर्म देता है। इस युग का धर्म है, भगवान को पहचानना। उनका ज्ञान प्राप्त करना और उनकी बताई हुई सामाजिक शिक्षाओं पर चलना। इस युग की सामाजिक शिक्षा है ‘एकता’। एकता की शुरूआत परिवार से होती है। इसीलिए कहा भी गया है कि पारिवारिक एकता के अभाव में विश्व एकता की कल्पना तक नहीं की जा सकती।

सृष्टि के रचनाकार परमपिता परमात्मा का अस्तित्व

– डॉ. जगदीश गांधी
शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
आज मानव जाति अनेक समस्याओं, कुरीतियों तथा मूढ़ मान्यताओं से पीड़ित तथा घिरा हुआ है। मनुष्य परमात्मा के दर्शन भौतिक आंखों से करना चाहता है। आज धर्म का स्थान बाहरी कर्म-काण्डों ने ले लिया है। हम सभी जानते हैं कि अध्यात्म भारतीय संस्कृति का प्राण तत्व है। अध्यात्म अनुभव का क्षेत्र है और इसकी प्रक्रियाओं व वैज्ञानिक प्रयोगों को प्रत्यक्ष दिखाया नहीं जा सकता, जैसे- हम वायु को देख नहीं सकते, केवल अनुभव कर सकते हैं, ठीक उसी तरह अध्यात्म के वैज्ञानिक प्रयोग स्थूलजगत में देखे नहीं जा सकते, केवल उनके परिणामों को देखा जा सकता है। अध्यात्म चेतना का विज्ञान है। भौतिक विज्ञान की सीमाएँ जहाँ समाप्त होती हैं, वहाँ से अध्यात्म विज्ञान की शुरूआत होती है। इस सृष्टि में पदार्थ और चेतना अर्थात प्रकृति व पुरूष, दोनों साथ-साथ मिलकर कार्य करते हैं। जैसे हमारे शरीर में जब तक पुरूष रूपी जीवात्मा है तब तक प्रकृति के पंचतत्वों से बना यह शरीर जीवित है। जीवात्मा के शरीर से पृथक होते ही पंचतत्वों से बना यह शरीर निर्जीव व निष्क्रिय हो जाता है। आज के वर्तमान समय में विज्ञान जहाँ भौतिक जगत का प्रतिनिधित्व कर रहा है, वहीं अध्यात्म चेतना जगत का प्रतिनिधित्व कर रहा है। विज्ञान वह है, जो इंद्रियों के द्वारा जाना-समझा जाता है; जबकि अध्यात्म विश्वास, समर्पण व आत्मानुभूति द्वारा जाना जाता है। इसे वास्तव में चेतना का विज्ञान कह सकते हैं और इस चेतना का जितना विकास होगा, हमारी प्रकाशित बुद्धि व विवेक उसी मात्रा में जाग्रत होती जायेगी। जीवन को समग्र रूप से जानने व जीवन जीने के विज्ञान को भी अध्यात्म कह सकते हैं। अध्यात्म व विज्ञान, दोनों का ही उद्देश्य सत्य को जानना है, लेकिन दोनों एकदूसरे के बिना अधूरे हैं। यदि विज्ञान अध्यात्म को नकारता है, उसके निर्देशन व मार्गदर्शन की अवज्ञा करता है तो यह विनाशकारी होगा और यदि अध्यात्म विज्ञान का सहारा नहीं लेता तो इसे प्रामाणिक रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता और यह अंधविश्वास व मूढ़ मान्यताओं के जैसा प्रतीत होगा। हमारा मानना है कि यदि अध्यात्म और विज्ञान दोनों मिलकर आगे बढ़े तो निश्चित रूप से अपने लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं और सृष्टि के लिए कल्याणकारी व मानव-विकास के पथ को प्रशस्त कर सकते हैं। यदि इन दोनों ने मिलकर कार्य किया तो भविष्य में ‘वैज्ञानिक अध्यात्मवाद’ एक नूतन दर्शन के रूप में प्रतिष्ठित होगा; जिससे मानव जीवन का परम कल्याण संभव है। परमात्मा का अनुभव कहने की बात नहीं है, बस, प्रतिक्षण उसे जिया ही जा सकता है। उस परम अनुभूति में स्वयं को डुबोया जा सकता है, सराबोर किया जा सकता है। लहर सागर में है और सागर भी लहर में है, फिर भी इस कथन में एक रहस्य है- पूरी की पूरी लहर तो सागर में हैं, पर पूरा का पूरा सागर लहर में नहीं है। अनुभव-खासतौर पर परम सत्य का अनुभव सागर जैसा है और अभिव्यक्ति तो बस, लहर जैसी है, जो थोड़ी सी खबर लाती है, लेकिन अनंत गुना अनुभव का सच पीछे छूट जाता है। वैसे भी शब्द परमात्मा के अस्तित्व को नहीं बाँध सकते। इनकी सीमा में अनंत नहीं समा सकता। शब्द तो बस, छोटी-छोटी खिड़कियों की तरह हैं; जबकि परमात्मा के अस्तित्व के अनुभव का, सत्य के स्वरूप व प्रेम का आकाश अनंत है, असीम है।

दुनिया को बेहतर लौटाने की कोशिश होनी चाहिए

प्रदीप कुमार सिंह ‘पाल’
शैक्षिक एवं वैश्विक चिन्तक
राजस्थान के बाड़मेर के रहने वाले ओम प्रकाश डूडी का चयन एमबीबीएस में हुआ था। वह पढ़ाई के लिए महाराष्ट्र के शोलापुर मेडिकल कालेज पहुंचे। यहां अपनी सहपाठी स्नेहा से उनका मिलना हुआ और दोनों में प्यार हो गया। 2006 में डॉ. ओम की तबीयत खराब हुई तथा डाक्टरों ने कहा कि उनकी किडनियां खराब हैं। 2007 में ओम की किडनी का ट्रांसप्लांट हुआ जो उसकी मां ने दी थी। स्नेहा ने 2009 में डा. ओम से लव मैरिज कर ली। पति की दूसरी किडनी खराब होने के कारण डॉ. स्नेहा ने तय किया कि अब अपने सुहाग पर आए संकट के लिए वह खुद आगे आएंगी। स्नेहा ने 6 फरवरी 2017 को अपने पति डॉ. ओमप्रकाश को किडनी दे दी। स्नेहा की एक किडनी ओम के शरीर में है। यह पति-पत्नी के प्यार के एक अनुकरणीय मिसाल है। मध्य प्रदेश के दमोह में गरीबी के कारण जब लक्ष्मी प्रसाद मिस्त्री ‘रमा’ की पत्नी खिलौना बहू ने तेज बुखार के कारण दम तोड़ दिया, तो उन्होंने पत्नी के अंतिम संस्कार के बाद संध्या बेला में उसकी याद में कुछ ऐसा करने की ठानी की वह हमेशा हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई। पत्नी की याद में हटा के मुक्तिधाम में वर्ष 1921 को बनाया गया यह स्मारक पति का पत्नी के प्रति अपार प्रेम दर्शाता है। पेशे से निर्माण मिस्त्री रमा ने इस स्मारक के चारों ओर हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू और संस्कृत भाषा में पंक्तियां अंकित की हैं। वहीं ग्वालियर में पत्नी की रोज-रोज की प्रताड़ना से तंग आकर तलाक के लिए अदालत पहुंचे पति ने वेलेन्टाइन डे से एक दिन पहले तीन बच्चों की खातिर पत्नी से समझौता कर लिया। आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती ने उन्नीसवीं शताब्दी में स्त्रियों की दुर्दशा देखकर इस विषय का अत्यन्त गहन अध्ययन किया। उनकी प्रेरणा से नारी शिक्षा और सुरक्षा के प्रति समर्पित डीएवी आंदोलन आज भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इमरान खान का जन्म राजस्थान के अलवर जिले के खरेदा गांव में हुआ था। वह स्कूल के दिनों से ही वैज्ञानिक बनना चाहते थे। वह वैज्ञानिक तो नहीं बन सके, लेकिन वह टीचर बन गये। दो वर्षीय टीचिंग कोर्स करने के बाद वर्ष 1999 में सरकारी स्कूल में टीचर की नौकरी मिल गई। इमरान खान ने हिन्दी भाषा में शैक्षिक ऐप्स बनाए हैं। उनका मानना है कि अपनी भाषा में पढ़ने में बच्चे सहज महसूस करते हैं और वह उनके लिए हिन्दी में शैक्षिक ऐप्स बनाते हैं। अब तक वह 65 शैक्षिक ऐप्स और सौ से अधिक वेबसाइटें बना चुके हैं। लाखों बच्चे उनके शैक्षिक ऐप्स तथा वेबसाइटों से अपने ज्ञान का बेहतर बनाने का लाभ उठा रहे हंैं। सफलता न तो समय की मोहताज होती है और न ही उम्र की। दुनिया में आज बहुत से ऐसे युवा उद्यमी हंै, जिन्होंने स्कूल के दिनों में अपना बिजनेस शुरू किया और देखते ही देखते दुनिया के शीर्ष बिजनेस मैन की सूची में शामिल हो गए। मंजिल उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता हौंसलों से उड़ान होती है। ये पंक्तियां उन लोगों को समर्पित हैं जिन्होंने जीवन के संघर्ष में विजयी होकर विभिन्न परिस्थितियों में नवीन सृजन किया है। ऐसे लोगों ने सामने आकर स्वयं का और समाज का नेतृत्व किया है। इन युवा पीढ़ी में सोशल मीडिया फाउंडर बॉबी मर्फी, ब्रांडिंग किंग फरयाद एसिडवाला, मेडिकल प्रोफेशनल एलिजाबेथ एनी होम्स, ऐप डेवलपर रॉबर्ट मोजाह ब्रिजेज, कुकिंग एक्सपर्ट लीजा मैरी, टॉप कंसल्टेंट कैमरून जॉनसन आदि शामिल हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी जावेद अख्तर साहित्य के क्षेत्र में एक जाना-माना नाम हैं। बेहद-चढ़ाव भरी जिंदगी जीने वाले जावेद अख्तर ने जीवन की सच्चाइयों को बहुत करीब से देखा, सुना तथा जाना है। कभी अच्छे या बुरे की शिकायत न करने वाले जावेद अख्तर हमेशा दुनिया को बेहतर लौटाने की कोशिश करते रहे हैं। बुलंदियों के इस दौर में भी उनकी सहानुभूति पिछड़े, गरीब लोगों के प्रति रही है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में जन्मे जावेद अख्तर के पिता जाने-माने प्रगतिशील कवि व माता उर्दू की लेखिका तथा शिक्षिका थीं।कश्मीर के जिला बलगाम के युवक नजीर अहमद लोन ने न कौम को आड़े आने दिया और न ही इलाकाई
संबंधों को। यहां तक कि भ्रष्ट अफसरों ने नजीर पर आतंकवादी होने का झूठा आरोप तक लगा कर इस कश्मीरी युवक को दबाने की कोशिश की। अपनी ही कौम के लोगों ने धमकाया-बरगलाया लेकिन यह आठवीं पास युवक नजीर अहमद लोन नहीं रूका। कश्मीर घाटी के गांव से आरटीआई लगाई और खोलता चला गया अपनी ही कौम के अफसरों की पोल। शॉल बेचकर अपने परिवार का गुजर-बसर करने वाले नजीर बताते हैं कि बाहर के दुश्मनों से लड़ना कई बार आसान होता है लेकिन अपने ही लोगों से लड़ना बहुत कठिन होता है। भारत ने अंतरिक्ष में दुनिया को पछाड़ने का कीर्तिमान बनाया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने एक ही रॉकेट से रिकॉर्ड 104 उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण कर इतिहास रचा दिया। इसरो को सिर्फ एक सफल अंतरिक्ष एजेंसी ही नहीं, वह पूरे देश के लिए एक रोल मॉडल है। इसरो के कामकाज में हमें जो जज्बा दिखाई देता है, आगे बढ़ने के लिए पूरे देश को उसी जज्बे की जरूरत है। इन भारतीय वैज्ञानिकों की जितनी प्रशंसा की जाये वह कम हैं। वह दिन दूर नहीं जब इंसान पृथ्वी के बाहर ब्रह्माण्ड में किसी ग्रह में बसने तथा जीवन की खोज करने में सफल होगा। मनुष्य के रूप में हमारा धरती पर जन्म होना ही अपने आपमें सबसे बड़ा सौभाग्य है। इसके अलावा इस शरीर में जीवित रखने वाली सांस का चलना सबसे बड़ा आश्चर्य है। कुदरत ने इंसान के लिए भरपूर चीजें दे रखी हैं। एक गेहूँ का दाना बोने से कुदरत कई गुना हम वापिस करती है। कुदरत से सीख लेकर हमें दुनिया को बेहतर लौटाने की कोशिश हर पल करनी चाहिए।

क्या ऐसे ही गढ़ा जायेगा देश का भविष्य?

अजय कुमार श्रीवास्तव
शिक्षाविद
गोमती नगर, लखनऊ
एक परिवार, समाज और देश का विकास इस बात पर निर्भर करता है कि उनके बच्चों को किस प्रकार की शिक्षा मिल रही है। शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 के द्वारा सरकार ने देश के 6 से 14 साल तक के प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का मौलिक अधिकार तो प्रदान कर दिया किन्तु इस अधिकार के अन्तर्गत देष के गाँव-गाँव में रहने वाले प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे मिले? इस ओर कोई ठोस कदम नहीं उठाया। हम सभी जानते हैं कि भारत गाँवों का देश है। यहां की अधिकांश आबादी इन्हीं गाँवों में ही निवास करती है। इन्हीं गाँवों की स्कूली शिक्षा पर काम करने वाली गैर सरकारी संस्था ‘प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन’ द्वारा हाल ही में जारी एनुअल स्टेटस आॅफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर-2016) के अनुसार शिक्षा पर भारी खर्च के बाद भी ग्रामीण भारत के सरकारी स्कूलों (जहां कि नि:शुल्क शिक्षा के साथ ही सरकार उन्हें दोपकर का खाना, किताबें, कापियां, छात्रवृत्ति और बैग तक मुफ्त दे रही है।) की स्थिति में अपेक्षित सुधार देखने को नहीं मिला है। देश के 589 ग्रामीण जिलों के 15,630 सरकारी स्कूलों तथा 3 से 16 आयु वर्ग के 562,305 बच्चों पर किये गये सर्वेक्षण के आधार पर प्रकाशित एन्युअल स्टेटस आॅफ एजुकेशन रिपोर्ट 2016 बताती है कि देश के सरकारी स्कूलों के कक्षा 3 के 57.5 प्रतिशत बच्चे कक्षा 1 स्तर का पाठ नहीं पढ़ सके, 72.3 प्रतिशत बच्चे दो अंकों वाले घटाव के सवाल को हल नहीं कर सके और 68% बच्चे अंग्रेजी के सामान्य शब्द नहीं पढ़ सके। इसी रिपोर्ट के अनुसार कक्षा 5 के 74.00 प्रतिशत बच्चे साधारण भाग के सवाल हल नहीं कर सके। रिपोर्ट बताती है कि कक्षा 8 के 56.7 प्रतिशत बच्चे 3 अंक का 1 अंक से भाग वाले सवाल को हल नहीं कर सके, 26.9 प्रतिशत बच्चे कक्षा 2 के स्तर का पाठ नहीं पढ़ सके और 54.8 प्रतिशत बच्चे अंग्रेजी के सामान्य वाक्य नहीं पढ़ सके। वास्तव में यह रिपोर्ट ग्रामीण भारत की प्राथमिक शिक्षा पर अत्यन्त ही चिंताजनक और झकझोरने वाली तस्वीर पेश करती है जबकि प्राथमिक शिक्षा ही किसी व्यक्ति के जीवन की वह नींव होती है, जिस पर उसके संपूर्ण जीवन का भविष्य तय होता है। यूनेस्को की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भी भारत में बच्चों को शिक्षा की उपलब्धता आसान हुई है। लेकिन गुणवत्ता का सवाल ज्यों का त्यों बना हुआ है और स्कूल जाने वाले बच्चे भी बुनियादी शिक्षा से वंचित हो रहे हैं। न्यू एजुकेशन पालिसी का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए पूर्व में बनी कमेटी के अध्यक्ष व पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी टीएसआर सुब्रमण्यम ने भी अपने एक साक्षात्कार में यह स्वीकार किया है कि जब से देश में राइट टू एजुकेशन एक्ट 2009 लागू किया गया है तब से शिक्षा की गुणवत्ता में 25 प्रतिशत गिरावट आ गई है। इन सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर चिन्ता व्यक्त करते हुए वर्ष 2015 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय को उत्तर प्रदेश सरकार को सरकारी मद से वेतन लेने वाले सभी अधिकारियों एवं अधिकारियों को अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाने का आदेश तक पारित करना पड़ा था। इस निर्णय के पीछे एक सीधी धारणा थी कि सत्तासीन वर्ग के बच्चे सरकारी स्कूलों मे पढ़ेंगे तो वहाँ के शैक्षिक स्तर में भी उन्नति होगी। इसके साथ ही सरकारी स्कूलों की शिक्षा के स्तर के संबंध में समय-समय पर मीडिया में दिखाई गई रिपोर्टे देश के सरकारी स्कूलों की बहुत ही भयानक तस्वीर प्रस्तुत करतीं हंै। शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के साथ ही सरकार को इन बातों पर ध्यान देना चाहिए कि उनके गाँव-गाँव में चलने वाले सरकारी स्कूलों एवं निजी स्कूलों की गुणवत्ता कैसे बढ़े? कैसे सरकारी स्कूलों में बच्चों एवं शिक्षकों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चत की जाये? कैसे इन सरकारी शिक्षकों की जवाबदेही तय की जायें? कैसे इन सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को मिलने वाले ज्ञान के स्तर को बढ़ाया जाये? इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को सम्मानजनक रूप से शिक्षा ग्रहण करने के लिए कुर्सी-मेज की व्यवस्था, बिजली, पानी, सफाई एवं शौचालय आदि की व्यवस्था कैसे की जाये? इन दिशाओं में ठोस कदम उठाने की बजाय सरकार ने शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 को लागू करके देश के केवल 15 प्रतिशत निजी स्कूलों की कक्षा 1 से 8 तक की 25 प्रतिशत सीटों को चंद दुर्बल वर्ग और अलाभित समूह के बच्चों के लिए आरक्षित करके देश के बच्चों के बीच एक भेदभाव की दीवार और भी खड़ी कर दी है। यह हमारे देश के बच्चों का दुर्भाग्य ही है कि आज हम मंगल ग्रह तक तो पहुंच गये हैं किन्तु आज भी हमारे सरकारी स्कूलों में बच्चे भीषड़ जाड़े और गर्मी के मौसम में टाट पट्टियों पर बैठकर पढ़ने के लिए मजबूर हैं। इन सरकारी स्कूलों के कमरों में पंखे और बल्ब/ट्यूब लाइट तो लगे हैं किन्तु बिजली कनेक्शन के अभाव में यह मात्र शो पीस बनकर रह गये हैं। विश्व बैंक के भारत में क्षेत्रीय निदेशक ओनो रूल का मानना है कि ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम की सफलता के लिए भारत को प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की गुणवत्ता पर विशेष जोर देना चाहिए। दुनिया का इतिहास गवाह है कि विकसित देशों के विकास में वहां की शिक्षा व्यवस्था ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विकसित देशों में नीतिगत रूप से शिक्षा को शीर्ष प्राथमिकता में रखा गया है, पर हमारे देश में शिक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।

मृत्यु अपने ‘असली वतन’ जाने की यात्रा

– डॉ. जगदीश गांधी, संस्थापक-प्रबन्धक, सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
इस सत्य को जानना चाहिए कि शरीर से अलग होने पर भी आत्मा तब तक प्रगति करती जायेगी जब तक वह परमात्मा से एक ऐसी अवस्था में मिलन को प्राप्त नहीं कर लेती जिसे सदियों की क्रान्तियाँ और दुनिया के परिवर्तन भी बदल नहीं सकते। यह तब तक अमर रहेगी जब तक प्रभु का साम्राज्य, उसकी सार्वभौमिकता और उसकी शक्ति है। यह प्रभु के चिह्नों और गुणों को प्रकट और उसकी प्रेममयी कृपा और आशीषों का संवहन करेगी। बहाई धर्म के संस्थापक बहाउल्लाह कहते हंै कि हमें यह जानना चाहिए कि प्रत्येक श्रवणेंद्रीय, अगर सदैव पवित्र और निर्दोष बनी रही हो तो अवश्य ही प्रत्येक दिशा से उच्चरित होने वाले इन पवित्र शब्दों को हर समय सुनेगी। सत्य ही, हम ईश्वर के हैं और उसके पास ही वापस हो जायेंगे। मनुष्य की शारीरिक मृत्यु के रहस्यों और उसकी असली वतन अर्थात दिव्य लोक की अनन्त यात्रा को प्रकट नहीं किया गया है। माता के गर्भ में बच्चे के शरीर में परमात्मा के अंश के रूप में आत्मा प्रवेश करती है। जिसे लोग मृत्यु कहते हैं, वह देह का अन्त है। शरीर मिट्टी से बना है वह मृत्यु के पश्चात मिट्टी में मिल जाता है। परमात्मा से उनके अंश के रूप में आत्मा संसार में मानव शरीर में आयी थी मृत्यु के पश्चात आत्मा शरीर से निकलकर अपने असली वतन (दिव्य लोक) वापिस लौट जाती है। मृत्यु संसार से अपने ‘असली वतन’ जाने की यात्रा है। मृत्यु प्रत्येक दृढ़ अनुयायी को वह प्याला अर्पित करती है जो वस्तुत: जीवन है। यह आनन्द की वर्षा करती है और प्रसन्नता की संवाहिका है। यह अनन्त जीवन का उपहार देती है। जिन्होंने मनुष्य के भौतिक जीवन का आनन्द उठाया है, जो आनन्द एक सत्य प्रभु को पहचानने में निहित है, उनका मृत्यु के बाद का जीवन ऐसा होता है, जिसका वर्णन करने में हम असमर्थ है। यह ज्ञान केवल सर्वलोकों के स्वामी प्रभु के पास ही है। इस युग में व्यक्ति का संपूर्ण कर्तव्य यह है कि उस पर प्रभु द्वारा बरसायी जाने वाली अनन्त कृपा के अमृत जल का भरपूर पान करें। किसी को भी उस कृपाजल की विशालता या लघुता पर विचार नहीं करना चाहिए। उस कृपाजल का भाग किसी की हथेली भर हो सकता है, किसी को एक प्याले भर मिल सकता है और किसी को असीम जलराशि की प्राप्ति हो सकती है। मनुष्य को उत्पन्न करने के पीछे का उद्देश्य उसे इस योग्य बनाने का है और सदा रहेगा कि वह अपने सृष्टा को जान सके और उसका सान्निध्य प्राप्त कर सके। इस सर्वोत्तम तथा परम उद्देश्य की पुष्टि सभी धर्मिक ग्रंथों गीता, त्रिपटक, बाइबिल, कुरान, गुरू ग्रन्थ साहिब, किताबे अकदस में अवतारों कृष्ण, बुद्ध, ईसा, मोहम्मद, नानक, बहाउल्लाह इत्यादि ने की है। जिस किसी ने भी उस दिव्य मार्गदर्शन के दिवा स्त्रोत को पहचाना है और उसके पावन दरबार में पदार्पण किया हैं, वह प्रभु के निकट आया है, उसने प्रभु के अस्तित्व को पहचाना है। वह अस्तित्व जो सच्चा स्वर्ग है और स्वर्ग के उच्चतम प्रसाद उसके प्रतीक मात्र है। ऐसा व्यक्ति उस स्थान को प्राप्त करता है जो बस, केवल दो पग दूर है। जो कोई भी उसे पहचानने में असफल रहा है, वह प्रभु से दूर होने का दु:ख उठायेगा। ऐसी दूरी असत्य-लोक और शन्ूय में विचरण करने के बराबर है। बाहरी तौर पर वह व्यक्ति चाहे सांसारिक सुखों के सिंहासन पर ही क्यों न विराजमान हो, किन्तु दिव्य सिंहासन के दर्शन से वह सदैव वंचित रहेगा। मानव जीवन के आरम्भ में मनुष्य गर्भाशय के संसार में भ्रूण की अवस्था में था। वहाँ उसने मानव-अस्तित्व की वास्तविकता के लिये क्षमता और संपन्नता प्राप्त की। इस संसार के लिये आवश्यक शक्तियाँ और साधन शिशु को उसकी उस सीमित अवस्था में दिये गये थे। इस संसार में उसे आँखों की जरूरत थी उसने उसे इस संसार में पाया। उसे कानों की जरूरत थी, उसे उसने वहाँ तैयार पाया, जो उसके नये अस्तित्व की तैयारी थी। जिन शक्तियों की आवश्यकता उसे इस दुनिया के लिये थी, उन्हें गर्भाशय की अवस्था में दे दिया गया। अत: इस संसार लोक में उसे अगले जीवन की तैयारी अवश्य ही करनी चाहिये। प्रभु के साम्राज्य में उसे जिसकी जरूरत पडेगी, उसे यहाँ अवश्य ही प्राप्त कर लेना चाहिये। जैसे उसने गर्भावस्था में ही इस दुनियाँ के अस्तित्व के लिये सभी शक्तियाँ अर्जित कर ली उसी तरह दिव्य अस्तित्व के लिये जिन अपरिहार्य शक्तियों की आवश्यकता है, उन्हें अवश्य इस संसार में प्राप्त कर लेना चाहिये। आत्मा की प्रकृति के सम्बन्ध में हमें यह जानना चाहिए कि यह ईश्वर का एक चिह्न है, यह वह दिव्य रत्न है जिसकी वास्तविकता को समझ पाने में ज्ञानीजन भी असमर्थ रहे हंै और जिसका रहस्य किसी भी मस्तिष्क की समझ से परे है, चाहे वह कितना भी तीक्ष्ण क्यों न हो। प्रभु की श्रेष्ठता की घोषणा करने में सभी सृजित वस्तुओं में वह प्रथम है, उसकी ज्योति को पहचानने में प्रथम है, उसके सत्य को मानने में प्रथम है और उसके समक्ष नतमस्तक होने में प्रथम है। यदि वह प्रभु का आज्ञापालक है तो वह उसके प्रकाश को प्रतिबिम्बित करेगा और अन्तत: उसी में समाहित हो जायेगा। यदि प्रभु से तादात्म्य स्थापित करने में असमर्थ रहता है तो यह स्वार्थ और वासना का शिकार बनेगा और अन्त में उन्हीं की गहराईयों में डूब कर रह जायेगा।

विश्वव्यापी समस्याओं का समाधान निकालने में ही समझदारी!

– प्रदीप कुमार सिंह ‘पाल’, शैक्षिक एवं वैश्विक चिन्तक
अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्विटर पर वादा करते हुए लिखा है कि उत्तर कोरिया कोई भी ऐसा परमाणु मिसाइल नहीं बनाएगा जो अमेरिकी क्षेत्र तक पहुंचने में सक्षम हो। ट्रंप का बयान उत्तर कोरिया नेता किम जोंग-उन के उस बयान के बाद आया है जिसमें उन्होंने ट्रंप पर एक तरह से दबाव बनाते हुए घोषणा की थी कि उनका देश अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल के निर्माण के अंतिम चरण में पहुंच गया है। ट्रंप ने ट्वीट करके कहा, उत्तर कोरिया ने हाल ही में कहा है कि वह अमेरिका के हिस्सों तक पहुंचने में सक्षम होने वाला परमाणु हथियार बनाने की दिशा में अंतिम चरण में है। चीन सागर में चीन अति आधुनिक तथा मारक मिसाइलें तैनात कर रहा है। सेटेलाइट से ली गई तस्वीरें इस सत्य को दुनिया के सामने उजागर करती हैं। चीन ने अपनी मिलिट्ररी पॉवर का प्रदर्शन करने के लिए वहां पर जोरदार युद्ध अभ्यास भी किया है। चीन सागर के द्वीपों को लेकर अन्य देश भी अपना अधिकार व्यक्त कर चुके हैं। चीन की राज्य विस्तार की नीति इस क्षेत्र के साथ पूरे विश्व के लिए खतरा बन गयी है। अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा ताईवान से बातचीत करने पर चीन ने अमेरिका को धमकी दी है। भारत का चीन के साथ सीमा विवाद को लेकर हमेशा तनाव बना रहता है। अमरीका के निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक निकट सहयोगी ने कहा कि व्हाइट हाउस में दाखिल होने के पहले दिन ही ट्रंप वर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा के उन कई कार्यकारी फैसलों को पलट देंगे, जिनके बारे में उनको लगता है कि इनसे आर्थिक प्रगति और रोजगार सृजन दोनों प्रभावित हुए हैं। ट्रंप के होने वाले व्हाइट हाउस प्रवक्ता सीन स्पाइसर ने एबीसी न्यूज के कार्यक्रम ‘द वीक’ में कहा कि ट्रंप तत्काल उन कई कदमों को निरस्त करेंगे जिन्हें मौजूदा प्रशासन की ओर से बीते आठ माह में उठाया गया है और जिनके कारण आर्थिक विकास एवं रोजगार सृजन बाधित हुआ है। अमेरिका विश्व की सबसे बड़ी महाशक्ति है। आगे हमें देखना है कि ट्रंप के उठाये जाने वाले कदमों का अमेरिका सहित दुनिया पर क्या अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ता है? हाल ही में यमन के अशांत समुद्र तटीय शहर अदन में एक आत्मघाती हमले में 43 सैनिक मारे गए और 60 घायल हुए हैं। हफ्ते भर पहले भी आईएस आतंकियों के हमले में 50 सैनिक मारे गए थे। अधिकारियों के अनुसार हमला खोर माकसर इलाके में तब हुआ जब सैनिक अपना वेतन लेने के लिए कतार में खड़े हुए थे। तभी शरीर में विस्फोटक बांधे शख्स ने पास आकर खुद को उड़ा लिया। घायल हुए 60 सैनिकों में से कई की हालत गंभीर है। अंतरराष्ट्रीय मान्यता वाली यमन की निर्वासित सरकार पड़ोसी देश सऊदी अरब से काम कर रही है। उसने अदन को अपनी अस्थायी राजधानी बना रखा है। यमन के अपदस्त प्रेसीडेंट मंसूर अल हादी ने भी सऊदी अरब में ही शरण ले रखी है। प्रत्येक विश्ववासी को इस बात का दु:ख, संवेदना तथा दर्द होना चाहिए कि हमारे आसपास बेकसूर लोग रोजाना बड़ी संख्या में मारे जा रहे हैं। इन घटनाओं का सबसे बड़ा असर बच्चों तथा महिलाओं पर पड़ता है। पाकिस्तान की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वहां के आतंकी संगठन ही सरकार के प्रवक्ता बन जाते हैं और जब वे प्रवक्ता बन जाएं तो उनसे भड़काऊ स्टेटमेंट की ही अपेक्षा करनी चाहिए। पाकिस्तान के लिए यह नई बात नहीं है और इस बात को आतंकी हाफिज सईद ने एक बार फिर साबित किया है। आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक और जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद ने पिछले दिनों कहा कि वह भारत के गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह की उस टिप्पणी को ह्ययुद्ध की घोषणाह्ण मानता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर पाकिस्तान आतंकवाद पर काबू नहीं पाता है, तो वह दस टुकड़ों में विभाजित हो जाए। पाकिस्तान अपनी करनी का फल खुद भुगत रहा है। वह आतंकवाद खुद सबसे ज्यादा शिकार है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पाकिस्तानी आतंकवादी मसूद अजहर को प्रतिबंधित करने के प्रयासों में बार-बार रोड़ा खड़ा कर रहे चीन को दुनिया की आवाज सुनने की सलाह दी है। चीन में भी आतंकवादी संगठन हैं और वह भी इस खतरे को पहचानता है। चीन एक परिपक्व और जिम्मेदार राष्ट्र के नाते इस मसले पर दोहरे मापदंड अपनाने से खुद को पराजित करने वाले और आत्मघाती खतरों को समझेगा। भारत की ओर से लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि के लगातार सफल परीक्षण से चीन परेशान हो गया है। चीन की सरकारी मीडिया ने अपने संपादकीय में भारत के इस कदम की आलोचना की है। इसके अलावा भारत में विदेशी कंपनियों के बढ़ते निवेश को लेकर भी चीन में डर समा रहा है। चीनी मीडिया ने अपनी आलोचना में कहा कि यदि भारत मिसाइल कार्यक्रम पर विराम नहीं लगाता तो वह पाकिस्तान को मदद देगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सीरियाई शहर एलेप्पो में मानवाधिकारों का निर्मम उल्लंघन हुआ है। सवाल यह है कि युद्ध विराम असरदार तरीके से लागू होने और उसके अच्छे नतीजे हासिल करने के लिए जरूरी है कि सभी पक्ष इसका सम्मान करेंगे? यह भी वास्तविकता है कि अरब जगत में अमरीका, सऊदी अरब और रूस के गठबंधन से लाखों लोग बेघर हो चुके हैं। समस्या सामरिक ही नहीं राजनीतिक भी है। दुनिया में आतंक का कहर बदस्तूर जारी है। आतंकियों ने हमलों का तरीका बदला है। ज्यादातर पर्यटकों को निशाना बनाकर हमले किए गए हैं। यूरोप के सुरक्षित माने जाने वाले बड़े देशों फ्रांस, जर्मनी में आतंकी हमले बढ़े। कभी ट्रक से रौंदकर तो कभी गोलीबारी का दहशत फैलाई गई। आईएस की दहशत भारत के पड़ोसी देशों तक पहुंच गई। सीरिया और इराक में आतंकी संगठन आईएस की ताकत कम हुई। आईएस को एक साथ कई मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ी। सीरिया के हवाई हमले में बचे 5 वर्षीय दानिश की तस्वीर मानवता व आतंक के संघर्ष का प्रतीक बन गई। तुर्की में रूसी राजदूत आंद्रे कार्लोव की हत्या ने दुनिया भर में सनसनी फैला दी है। शुरूआती रिपोर्टों में कहा गया है कि हत्यारा कोई पुलिसकर्मी था, जो सीरियाई शहर एलेप्पो में हो रहे जनसंहार और तबाही से नाराज था। टीवी फुटेज से भी पता चल रहा है कि उसने हमले के दौरान बार-बार कहा कि ‘एलेप्पो को मत भूलो।’ रूस ने इसे एक आतंकवादी हमले के रूप में लिया है। अमेरिका समेत बाकी तमाम देशों ने घटना की निंदा करते हुए एक स्वर से कहा है कि कूटनीतिक अधिकारियों पर इस तरह का हमला हर हाल में अस्वीकार्य है। विश्व के विभिन्न देशों में घटित हो रही इन हिंसक घटनाओं की जड़ें विभिन्न रूपों में पाई जा सकती हैं – धार्मिक कट्टरता, वैचारिक धर्मांधता, गरीबी, असंतोष। इनमें से किसी के लिए भी आतंकवादियों को माफ नहीं किया जा सकता। सरकारें अपने तरीकों से जवाब देती है। सोशल मीडिया के इस युग में खौफ और आशंकाएं बड़ी तेजी से फैलती हैं। आतंकवाद विरोधी कदमों को मुसलमानों के खिलाफ लड़ाई नहीं बनने देना चाहिए। मुसलमान खुद भी दहशत और नफरत के शिकार बनते रहे हैं। रूस ने चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) प्रोजेक्ट का सपोर्ट किया है। इतना ही नहीं उसने अपने यूरोशियन इकोनॉमिक यूनियन प्रोजेक्ट को सीपीईसी से लिंक करने की मंशा भी जाहिर की है। जाहिर है रूस के इस स्टेटमेंट के बाद भारत की चिंता बढ़ेगी, इसलिए भी क्योंकि रूस पहले कहता रहा है कि उसकी सीपीईसी में कोई दिलचस्पी नहीं है। यही वजह है कि भारत इस बात से हैरान है कि रूस ने इन दावों को पहले खारिज कर दिया था, लेकिन अब इससे पलट गया है। महाशक्तियों के इस तरह के आचरण से हमें प्रभावित नहीं होना चाहिए। हमारा फोकस मानव जाति के कल्याण की तरफ होना चाहिए। विश्व की महाशक्तियां अमेरिका, चीन तथा रूस अपनी बमों की शक्ति से दुनिया को चलाना चाहती हैं। क्या मानव जाति के पास शस्त्रों की होड़ के तथा आतंकवाद के अलावा कोई शान्तिपूर्वक विकल्प नहीं बचा है? आदि मानव पहले पत्थरों तथा लाठी-डण्डों से लड़ता था, फिर तलवार-भालों से, फिर बन्दूकों से तथा अब परमाणु बमों की ताकत बढ़ाकर एक-दूसरे से आगे जाने की होड़ कर रहा है। विश्व के देशों को एक-दूसरे को डराने-धमकाने की वर्तमान स्थिति को देख-सुनकर तृतीय विश्व युद्ध होने के डरावने संकेत रह-रहकर हमें मिलते हैं। हम विश्वास से कह सकते हैं बमों तथा आतंकवाद से घिरी दुनिया के पास शान्तिपूर्ण विकल्प – विश्व की सरकार, विश्व संसद तथा विश्व न्यायालय बनाने के रूप में अभी हमारे पास है। इस शान्तिपूर्ण विकल्प की ओर हमें समझदारी से एक कदम आगे बढ़ाना चाहिए। विश्व एकता की शिक्षा इस युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है। बच्चों को बाल्यावस्था से विश्व एकता की शिक्षा मिलनी चाहिए। आज विश्व भर में जो भी मारामारी हो रही है इसके पीछे उद्देश्यहीन शिक्षा का दोष है। शिक्षा ही किसी को संसार का अच्छा इंसान तथा किसी को शैतान बनाती है। जहां से बीमारी शुरू हुई है वहीं से जड़ में जाकर बीमारी को खत्म करना होगा। युद्ध के विचार सबसे पहले मनुष्य के मस्तिष्क में पैदा होते हैं। मनुष्य के मस्तिष्क में शान्ति के विचार रोपना होगा। मनुष्य को शान्ति के विचार देने की सबसे श्रेष्ठ अवस्था बचपन है। विश्व एकता की शिक्षा ही आगे आने वाले विश्व के नागरिक तैयारी करेगी। बच्चों में विश्वव्यापी सोच, समझदारी तथा विश्वव्यापी दृष्टिकोण विकसित करना चाहिए। भारत को जगत गुरू की अपनी भूमिका को निभाना चाहिए। भारत को सारे विश्व को एकता एवं शान्ति का पाठ पढ़ाना चाहिए।